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गुरुवार, 12 नवंबर 2009

"दो मुक्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


(1)



धूप का आघात सहने के लिए सारी जमीं है।


गर्मियों में भी पहाड़ों मे जमी ठण्डी नमी है।


कट गई है गीत-गज़लों मे मेरी यह जिन्दगी,


किन्तु अब तक छन्द और लय में कमी है।।



(2)


दाल-आटा, शाक-फल से भी कुपोषण हो रहा।


कुछ नही मौलिक बचा है, पिष्ट-पेषण हो रहा।


क्या लिखें, किसको सुनाएँ, कौन छापेगा भला?


देवियों का मन्दिरों में, रोज शोषण हो रहा।।


19 टिप्‍पणियां:

  1. दाल-आटा, शाक-फल से भी कुपोषण हो रहा।


    कुछ नही मौलिक बचा है, पिष्ट-पेषण हो रहा।


    क्या लिखें, किसको सुनाएँ, कौन छापेगा भला?


    देवियों का मन्दिरों में, रोज शोषण हो रहा।


    bahut hi gahri baat kahi aapne.....

    उत्तर देंहटाएं
  2. देवियों का मन्दिरों में, रोज शोषण हो रहा।।
    बिडम्बना है ये तो. वाकई दुखद स्थिति है.
    सुन्दर अभिव्यक्ति दी है आपने

    उत्तर देंहटाएं
  3. मुक्तक माध्यम सही लिया गहरी बात कहने को..वाह!

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत गहरी बात कह दी आप ने इन मुक्तक मै.
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  5. waah..........

    aaj aap kuchh hat ke mood me hain.....

    yani mousam karvat badal raha hai khatima me bhi...

    abhinandan !

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपका सृजनात्मक कौशल हर पंक्ति में झांकता दिखाई देता है।

    उत्तर देंहटाएं
  7. "दाल-आटा, शाक-फल से भी कुपोषण हो रहा।
    कुछ नही मौलिक बचा है, पिष्ट-पेषण हो रहा।
    क्या लिखें, किसको सुनाएँ, कौन छापेगा भला?
    देवियों का मन्दिरों में, रोज शोषण हो रहा।। "

    dard ke saath gaherai bhari baat aapne sahaj sabdo me kahe di bahut hi badhiya ..sunder rachana ke liye aapka aabhar "

    ----- eksacchai { AAWAZ }

    http://eksacchai.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  8. मैं तो बस यह कह सकता हूँ कि मैंने हमेशा ही आप की रचनायों में अपने दिल की बात को पढ़ा है सो आपका मुरीद हूँ !
    आज भी कोई अपवाद नहीं है ! आपका बहुत बहुत आभार मुझ जैसे तमाम शब्दहीनो को शब्द देने के लिए !

    उत्तर देंहटाएं
  9. दाल-आटा, शाक-फल से भी कुपोषण हो रहा।
    कुछ नही मौलिक बचा है, पिष्ट-पेषण हो रहा।
    क्या लिखें, किसको सुनाएँ, कौन छापेगा भला?
    देवियों का मन्दिरों में, रोज शोषण हो रहा....
    वाह बहुत ही सुंदर और गहरी बात कह दिया आपने! लाजवाब पंक्तियाँ ! बहुत अच्छी लगी आपकी ये रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  10. देवियों का मन्दिरों में, रोज शोषण हो रहा।।

    बहुत सुन्दर शास्त्री जी, यही हकीकत है, बाहर लोग पूजने का ढोंग रचते है और और अन्दर ये कलयुगी अपनी औकात दिखा देते है !

    उत्तर देंहटाएं
  11. सामाजिक सरोकारों से ओत-प्रोत कविता...बेहतरीन

    उत्तर देंहटाएं
  12. sir please do check out
    www.simplypoet.com

    World's first multilingual poetry portal

    do post there you may be depriving a lot of people the opportunity to appreciate your beautiful creations.

    उत्तर देंहटाएं
  13. कट गई है गीत-गज़लों मे मेरी यह जिन्दगी,


    किन्तु अब तक छन्द और लय में कमी है।।
    वाह वाह मयंक जी लाजवाब शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  14. देवियों का मन्दिरों में, रोज शोषण हो रहा।।
    बहुत सच्चाई है इस पंक्ति में!
    दोनों मुक्तक सहेजने के काबिल हैं.
    महावीर शर्मा

    उत्तर देंहटाएं
  15. शास्त्री जी
    आपने बहिन जी संबोधित करते हुए लिखा , ह्रदय की सदभावना हम तक पहुँची |
    आपने लिखा
    कट गई है गीत-गज़लों मे मेरी यह जिन्दगी,
    किन्तु अब तक छन्द और लय में कमी है।।
    तो भाई जी ऐसी निराशा ठीक नहीं , आप तो बात बात में कैसे कैसे मुक्तक गढ़ते हैं ! रही बात जिन्दगी की छंद और लय की ,तो रास्ते कब आसान और समतल हुए हैं , बस जैसे हैं वैसे ही स्वीकार करना और उनसे सुंदर वीणा के स्वर निकाल लेने में ही कलाकारी है |बस बाकी दियाँ गल्लाँ छड्डो जी |
    शुभकामनाएं
    शारदा अरोरा

    उत्तर देंहटाएं
  16. bahut hi gahan likha hai.........adbhut soch ke sath gahri vedna prakat ho rahi hai.

    उत्तर देंहटाएं

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