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मंगलवार, 10 नवंबर 2009

"क्या तुम साथ निभाओगे?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")




राह कठिन है, पथ दुर्गम है, क्या तुम साथ निभाओगे?
पथरीली राहों पर चलते-चलते तुम थक जाओगे।।


मेरे साथ नही मस्ती है, विपदाओं से कुश्ती है,
आँधी और तूफानों से तुम निश्चित ही डर जाओगे।
पथरीली राहों पर चलते-चलते तुम थक जाओगे।।


तपन ग्रीष्म की, घन का गर्जन, बरसातों की बौछारें,
जाड़े की सिहरन-कम्पन को देख-देख रुक जाओगे।
पथरीली राहों पर चलते-चलते तुम थक जाओगे।।


मैं उजड़ा-बिगड़ा गुलशन हूँ, तुम हो खिलता हुआ चमन,
बाँह पकड़कर मरुथल की, तुम वीराना कहलाओगे।
पथरीली राहों पर चलते-चलते तुम थक जाओगे।।


तुम सुख में जीने वाले, मैं हूँ श्रम-साधक, मेहनतकश,
महलों को तजकर, तिनकों के घर में क्या रह पाओगे।
पथरीली राहों पर चलते-चलते तुम थक जाओगे।।


मैं श्यामल पूरबवाला, तुम गोरे पश्चिमवाले हो,
मेरे साथ-साथ चलकर, तुम उजला रूप गँवाओगे।
पथरीली राहों पर चलते-चलते तुम थक जाओगे।।

17 टिप्‍पणियां:

  1. मयंक जी लाजवाब रचना है बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  2. पोस्‍ट आपकी दस नवम्‍बर की
    पर हम दस नम्‍बरी नहीं हैं
    हम सदा साथ निबाहेंगे

    प्रतिकूलताओं में साथ रहें जी
    अपनी तो जीवन की मस्‍ती है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. मैं काला पूरबवाला, तुम गोरे पश्चिमवाले हो,
    मेरे साथ-साथ चलकर, तुम उजला रूप गँवाओगे।
    पूरब वाला कब से काले होने लगे. सूरज का निकलना सच तो है ही
    बहुत सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  4. वर्मा जी!
    पश्चिम में धूप ढलती है और पूरब में उगती है। इसीलिए ऐसा लिखा है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी रचना में भाषा का ऐसा रूप मिलता है कि वह हृदयगम्य हो गई है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. राह कठिन है, पथ दुर्गम है, क्या तुम साथ निभाओगे...badhai

    उत्तर देंहटाएं
  7. पथरीली राहों पर चलते-चलते तुम थक जाओगे।।
    बहुत सुंदर जी.
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  8. waah waah

    mayankji.........

    aanand kara diya...

    jaisi kavita padhne ka man ho raha tha usee tevar ki kavita aapse mil gayi.

    jai ho aapki

    उत्तर देंहटाएं
  9. वाकई, गजब की उम्दा रचना!!

    उत्तर देंहटाएं
  10. जड़ा-बिगड़ा गुलशन हूँ, तुम हो खिलता हुआ चमन,
    बाँह पकड़कर मरुथल की, तुम वीराना कहलाओगे।
    पथरीली राहों पर चलते-चलते तुम थक जाओगे।।

    yeh pantiyan bahut achchi lagi.....

    bahut hi khoobsoorat rachna...

    उत्तर देंहटाएं
  11. वाह शास्त्री जी आपने ख़ूबसूरत शब्दों के साथ लाजवाब रचना लिखा है ! हर एक शब्द दिल को छू गई !

    उत्तर देंहटाएं
  12. मैं श्यामल पूरबवाला, तुम गोरे पश्चिमवाले हो,

    मेरे साथ-साथ चलकर, तुम उजला रूप गँवाओगे।

    पथरीली राहों पर चलते-चलते तुम थक जाओगे।।

    कमाल है , इतने सारे टिप्पणीकार टिप्पणी दे चुके मगर एक ने भी शास्त्री जी से ये पूछने की जरुरत महसूस नहीं की कि आखिर ये है कौन ? हमें भी तो पता चले !!!

    उत्तर देंहटाएं
  13. गोदियाल जी!
    ये हमारी पश्चिमी सभ्यता है।
    जो श्रम नही केवत सुख ढूँढती है।

    उत्तर देंहटाएं
  14. महलों को तजकर क्‍या ... बहुत ही बेहतरीन शब्‍द रचना के साथ लाजवाब प्रस्‍तुति, आभार ।

    उत्तर देंहटाएं
  15. PRANAAM SHASHTRI JI ...
    LAJAWAAB RACHNA HAI .... DIL MEIN TOOFAN UTHAATI RACHNA .... LAJAWAAB

    उत्तर देंहटाएं

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