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सोमवार, 16 नवंबर 2009

"देश का दूषित हुआ वातावरण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


सभ्यता, शालीनता के गाँव में,
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
कर्णधारों की कुटिलता देखकर,
देश का दूषित हुआ वातावरण।


सुर हुए गायब, मृदुल शुभगान में,
गन्ध है अपमान की, सम्मान में,
आब खोता जा रहा है आभरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?


शब्द अपनी प्राञ्जलता खो रहा,
ह्रास अपनी वर्तनी का  हो रहा,
रो रहा समृद्धशाली व्याकरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?


लग रहे घट हैं भरे, पर रिक्त हैं,
लूटने में राज को, सब लिप्त हैं,
पंक से मैला हुआ सब आवरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?

17 टिप्‍पणियां:

  1. शब्द अपनी प्राञ्जलता खो रहा,
    ह्रास अपनी वर्तनी का हो रहा,
    रो रहा समृद्धशाली व्याकरण।
    खो गया जाने कहाँ है आचरण?


    bilkul sahi kaha aapne....

    bahut achchi lagi yeh post...

    उत्तर देंहटाएं
  2. "सभ्यता, शालीनता के गाँव मे,
    खो गया जाने कहाँ है आचरण?
    कर्णधारों की कुटिलता देखकर,
    देश का दूषित हुआ वातावरण।"

    बहुत ही सही कहा आपने आचरण दूषित तो हो ही रहा है ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सभ्यता, शालीनता के गाँव मे,
    खो गया जाने कहाँ है आचरण?
    कर्णधारों की कुटिलता देखकर,
    देश का दूषित हुआ वातावरण।
    आप ने आज का सच लिख दिया अपनी इस कविता मै,आज सारा देश ही दूषीत वाता वरण कर रहा है

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत बढ़िया रचना, शास्त्री जी.

    उत्तर देंहटाएं
  5. "लग रहे घट हैं भरे, पर रिक्त हैं,
    लूटने मे राज को, सब लिप्त है,
    पंक से मैला हुआ सब आवरण।"
    देश की व्यवस्था का सही चित्रं किया है आपने .सशक्त रचना

    उत्तर देंहटाएं
  6. लग रहे घट हैं भरे, पर रिक्त हैं,

    लूटने मे राज को, सब लिप्त है,

    पंक से मैला हुआ सब आवरण।

    खो गया जाने कहाँ है आचरण

    " bahut hi badhiya sir, bilkul sahi kaha hai aapne "

    ----- eksacchai { AAWAZ }

    http://eksacchai.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  7. waah waah shastriji !

    naman hai baar baar aapko.......

    शब्द अपनी प्राञ्जलता खो रहा,
    ह्रास अपनी वर्तनी का हो रहा,
    रो रहा समृद्धशाली व्याकरण।
    खो गया जाने कहाँ है आचरण?

    shaandaar kavita !

    abhinandan !

    उत्तर देंहटाएं
  8. एक बार फिर नमन करता हूँ आपको और आप की लेखनी को !

    उत्तर देंहटाएं
  9. ये हुई न बात। तभी तो कहते हैं
    घने दरख़्त के नीचे मुझे लगा अक्सर
    कोई बुज़ुर्ग मिरे सर पर हाथ रखता है।

    उत्तर देंहटाएं
  10. खो गया जाने कहाँ है आचरण ??

    जानते तो हम सभी है ...!!

    उत्तर देंहटाएं
  11. शब्द अपनी प्राञ्जलता खो रहा,

    ह्रास अपनी वर्तनी का हो रहा,

    रो रहा समृद्धशाली व्याकरण।

    खो गया जाने कहाँ है आचरण?




    सर , बहुत ही सुन्दर !

    उत्तर देंहटाएं
  12. सुर हुए गायब, मृदुल शुभगान में,
    गन्ध है अपमान की, सम्मान में,
    आब खोता जा रहा है आभरण।
    खो गया जाने कहाँ है आचरण?

    शास्त्री जी,
    वर्तमान को दर्पण दिखाती हुई कविता...हम तो बस यही कहेंगे - सत्य वचन

    उत्तर देंहटाएं
  13. जब कर्णधार कुटिल होगे तो वातावरण दूशित ही होगा

    उत्तर देंहटाएं
  14. hamesha ki tarah chot karti rachna...........aisa sirf aap hi likh sakte hain.........aapki lekhni ko naman.

    उत्तर देंहटाएं
  15. सभ्यता, शालीनता के गाँव मे,
    खो गया जाने कहाँ है आचरण?
    कर्णधारों की कुटिलता देखकर,
    देश का दूषित हुआ वातावरण।
    आपके इस रचना को पढ़कर मैं स्तब्ध हूँ! हर एक पंक्तियाँ इतना सुंदर है कि मैं एक ही बात कहूँगी की आपकी लेखनी को सलाम!

    उत्तर देंहटाएं
  16. देश के वातारण की गंदगी को आपने गहराई से परखा है।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

    उत्तर देंहटाएं
  17. कर्णधारों की कुटिलता देखकर,
    देश का दूषित हुआ वातावरण ..

    BAHUT KAMAAL KI LAAINE HAIN ... DESH KE HAALAAT KA SATEEK CHITRAN ...

    उत्तर देंहटाएं

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