"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

"दिखा कहीं श्रम-स्वेद नही" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



देश-वेश और जाति, धर्म  का , मन में कुछ भी भेद नहीं।
भोग लिया जीवन सारा, अब मर जाने का खेद नहीं।।


सरदी की ठण्डक में ठिठुरा, गर्मी की लू झेली हैं,
बरसातों की रिम-झिम से जी भर कर होली खेली है,
चप्पू दोनों सही-सलामत, पर नौका में  छेद कहीं।
भोग लिया जीवन सारा, अब मर जाने का खेद नहीं।।


सुख में कभी नही मुस्काया, दुख में कभी नही रोया,
जीवन की नाजुक घड़ियों में, धीरज कभी नही खोया,
दुनिया भर की पोथी पढ़ लीं, नजर न आया वेद कहीं।
भोग लिया जीवन सारा, अब मर जाने का खेद नहीं।।


आशा और निराशा का संगम है,  एक परिभाषा है,
कभी गरल है, कभी सरल है, जीवन एक पिपासा है,
गलियों मे बह रहा लहू है, दिखा कहीं श्रम-स्वेद नहीं।
भोग लिया जीवन सारा, अब मर जाने का खेद नहीं।।




13 टिप्‍पणियां:

  1. कभी गरल है, कभी सरल है, जीवन एक पिपासा है,

    सही विश्लेषण

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस कविता में प्रत्यक्ष अनुभव की बात की गई है, इसलिए सारे शब्द अर्थवान हो उठे हैं ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. दुनिया भर की पोथी पढ़ लीं, नजर न आया वेद कहीं।

    भोग लिया जीवन सारा, अब मर जाने का खेद नहीं।।

    Bahut Umdaa baat kah dee aapne !

    उत्तर देंहटाएं
  4. aadarniy shaastriji !

    baar baar ...lagaataar.......

    aapki kavitaaon ka main zabardast prashansak hota jaa raha hoon.

    prastut kavita ne man ko bada sukoon diya

    aapki vidha
    aapki lekhni
    aur aapke shabd saamrthya ko salaam !

    manse nahin........dil se...ha ha ha

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुख में कभी नही मुस्काया, दुख में कभी नही रोया,
    जीवन की नाजुक घड़ियों में, धीरज कभी नही खोया,
    दुनिया भर की पोथी पढ़ लीं, नजर न आया वेद कहीं।
    भोग लिया जीवन सारा, अब मर जाने का खेद नहीं।।
    वाह बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत ही सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुख में कभी नही मुस्काया, दुख में कभी नही रोया,
    जीवन की नाजुक घड़ियों में, धीरज कभी नही खोया॥
    वाह शास्त्री जी उम्दा पंक्तियाँ ! जीवन की यही सच्चाई है! सुख और दुःख दोनों ही हर इंसान के जीवन में आता है ! बहुत सुंदर रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  8. यही तो है जीवन का सच शास्त्री जी बहुत सुंदर रचना. धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  9. दुनिया भर की पोथी पढ़ लीं, नजर न आया वेद कहीं।

    भोग लिया जीवन सारा, अब मर जाने का खेद नहीं।।
    wah bahut sunder abhivyakti

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत सुंदर रचना!
    अब तबियत कैसी है आपकी ?

    उत्तर देंहटाएं
  11. गलियों मे बह रहा लहू है, दिखा कहीं श्रम-स्वेद नहीं।
    भोग लिया जीवन सारा, अब मर जाने का खेद नहीं।।

    -भावपूर्ण रचना!!

    उत्तर देंहटाएं
  12. कभी गरल है, कभी सरल है, जीवन एक पिपासा है,
    yahi saar hai jeevan ka--

    ***antim panktiyan behad prabhaavshaali lagin.

    bahut hi achchhee rachna hai.

    उत्तर देंहटाएं
  13. सुख में कभी नही मुस्काया, दुख में कभी नही रोया,
    जीवन की नाजुक घड़ियों में, धीरज कभी नही खोया,
    आशा और निराशा का संगम है, एक परिभाषा है,
    कभी गरल है, कभी सरल है, जीवन एक पिपासा ह

    सुन्दर अभिव्यक्तिै धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails