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गुरुवार, 5 नवंबर 2009

"गधों को मिठाई नही घास चाहिए" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



मीराबाई,सूर, तुलसीदास चाहिए।
गधों को मिठाई नही घास चाहिए।।

(यह चित्र "ताऊ श्री" के ब्लॉग से साभार चोरी किया है)


मोटे मगर गंग-औ-जमन घूँट रहे हैं,
जल के जन्तुओं का अमन लूट रहे हैं,
लोकतन्त्र में नेता सुभाष चाहिए।
गधों को मिठाई नही घास चाहिए।।



चूहे और बिल्ली जैसा खेल हो रहा,
सर्प और छछूंदर जैसा मेल हो रहा,
जहरभरी ऐसी ना मिठास चाहिए।
गधों को मिठाई नही घास चाहिए।।



कहीं है दिवाला और दीवाली कहीं है,
कहीं है खुशहाली और बेहाली कहीं है,
जनता को रोजी और लिबास चाहिए।
गधों को मिठाई नही घास चाहिए।।


मँहगाई की मार लोग झेल रहे हैं,
नेता घर में बैठे दण्ड पेल रहे हैं,
सिंहासन पर बैठी नही लाश चाहिए।
गधों को मिठाई नही घास चाहिए।। 

14 टिप्‍पणियां:

  1. गधे तो गधे हैं,
    अपनी बात पर अडे हैं,
    खिलाओ-खिलाओ मिठाई कितनी,
    वे तो घास खाने को खड़े हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  2. अरे वाह शाश्त्रीजी, ये सम्मेलन की रिपोर्ट कहां से ले आये? चित्र बहुत बढिया लगा पर एक कमी है. आप इनके नाम भी बता देते. दो को तो मैं पहचान गया. इनमे एक ताऊ और दूसरा योगिंद्र मोदगिल है.

    बाकी के नाम भी पीछे आने वाले बतादें तो शाश्त्री जी का रेकार्ड पूरा होजायेगा?:)

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  3. चूहे और बिल्ली जैसा खेल हो रहा,
    सर्प और छछूंदर जैसा मेल हो रहा,
    जहरभरी ऐसी ना मिठास चाहिए।
    गधों को मिठाई नही घास चाहिए।।

    bahut khoob.........kya baat kahi hai........badhayi.

    उत्तर देंहटाएं
  4. "मँहगाई की मार लोग झेल रहे हैं,
    नेता घर में बैठे दण्ड पेल रहे हैं,
    सिंहासन पर बैठी नही लाश चाहिए।
    गधों को मिठाई नही घास चाहिए।।"




    धन्य है आप ; कह दी हमारे भी मन की बात !

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर शास्त्री जी, आज तो अपने जोर का छक्का मार दिया, बहुत खूब, सत्यता को उजागर करती कविता !

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपका नाम लेने में डर नहीं लगता ताउजी इसीलिए आपका बता रहा हु एक आप हो :")

    उत्तर देंहटाएं
  7. चालाक किस्म के गधे तो मिठाई बेच कर घास
    खरीद लेंगे

    उत्तर देंहटाएं
  8. wah wah ekdam karaaree kavota hai Sir! ekdam sateek or chust..maja aa gaya padkar...sabke dil ki baat keh di aapne.

    उत्तर देंहटाएं
  9. कहीं है दिवाला और दीवाली कहीं है,
    कहीं है खुशहाली और बेहाली कहीं है,
    जनता को रोजी और लिबास चाहिए।
    गधों को मिठाई नही घास चाहिए।।

    यह चित्र "ताऊ श्री" के ब्लॉग से साभार चोरी किया है)

    sach padh kar maja aa gaya, thanks.

    उत्तर देंहटाएं
  10. सिंहासन पर बैठी नही लाश चाहिए।
    गधों को मिठाई नही घास चाहिए।।
    शास्त्री जी जब इन गधो का चारा नेता खा जाये तो बेचारे यह फ़िर क्या खाये,
    दो को तो मै भी पहचानता हुं, जो ताऊ ने बताये है, तीसरा लगता है कही देखा है,लेकिन समझ नही आ रही कहां देखा था.... सोच कर बताऊगां, वेसे इतने प्यारे प्यारे ओर मिठ्ठे लड्डू खाने को मिले तो कोन नही.......
    सीता राम

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  11. मज़ा आ गया शास्त्री जी ! बहुत खूब लिखा है आपने!

    उत्तर देंहटाएं
  12. वाह ! आपका और अपना चित्र देखकर सुभाष भदौरिया की याद आगई, वे भी अक्सर बहुत पैना लिखते हैं....
    शुभकामनायें भाई जी !

    उत्तर देंहटाएं

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