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शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

"विपत्ति जब सताती है, नमन शैतान करते है।" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



हमारा आवरण जिसने, सजाया और सँवारा है,
हसीं पर्यावरण जिसने, बनाया और निखारा है।
बहुत आभार है उसका, बहुत उपकार है उसका,
दिया माटी के पुतले को, उसी ने प्राण प्यारा है।।


बहाई ज्ञान की गंगा, मधुरता ईख में कर दी,
कभी गर्मी, कभी वर्षा, कभी कम्पन भरी सरदी।
किया है रात को रोशन, दिये हैं चाँद और तारे,
अमावस को मिटाने को, दियों में रोशनी भर दी।।


दिया है दुःख का बादल, तो उसने ही दवा दी है,
कुहासे को मिटाने को, उसी ने तो हवा दी है।
जो रहते जंगलों में, भीगते बारिश के पानी में,
उन्ही के वास्ते झाड़ी मे कुटिया सी छवा दी है।।


सुबह और शाम को मच्छर सदा गुणगान करते हैं,
जगत के उस नियन्ता को, सदा प्रणाम करते हैं।
मगर इन्सान है खुदगर्ज कितना आज के युग में ,
विपत्ति जब सताती है, नमन शैतान करते है।।


14 टिप्‍पणियां:

  1. सुबह और शाम को मच्छर सदा गुणगान करते हैं,

    जगत के उस नियन्ता को, सदा प्रणाम करते हैं।

    मगर इन्सान है खुदगर्ज कितना आज के युग में ,

    विपत्ति जब सताती है, नमन शैतान करते है।।
    बहुत खूब शास्त्री जी !

    उत्तर देंहटाएं
  2. दिया है दुःख का बादल, तो उसने ही दवा दी है,

    कुहासे को मिटाने को, उसी ने तो हवा दी है।

    - यही आस्था भारत की आत्मा है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. कभी-कभी लगता है कि ऊपर बैठा वह भी अपने बच्चों से खिलवाड़ करता रहता है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. kamaal
    kamaal
    kamaal

    ______prabhu ki badi kripa hai

    bahut hi uttam rachna
    abhinandan !

    उत्तर देंहटाएं
  5. शास्त्रीजी,
    बहुत दिनों के बाद आपका ब्लॉग खुल सका है और मैं आपकी कविता पढ़ पा रहा हूँ ! इस बीच के वक़्त की कई कवितायें मेरी पकड़ से छूट गईं.
    'अमावस को मिटाने को, दियों में रोशनी भर दी।।'
    खुदगर्ज़ इंसान और शैतान तो विपदा पड़े तभी नम्र हो पाटा है. आपकी इस कविता में युगसत्य मुखर हुआ है !
    सादर--आनंद.

    उत्तर देंहटाएं
  6. दिया है दुःख का बादल, तो उसने ही दवा दी है,
    कुहासे को मिटाने को, उसी ने तो हवा दी है।
    जो रहते जंगलों में, भीगते बारिश के पानी में,
    उन्ही के वास्ते झाड़ी मे कुटिया सी छवा दी है।।


    बहुत सुंदर पंक्तियाँ.... बेह्तारें अभिव्यक्ति के साथ .....सुंदर प्रस्तुति.....

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुबह और शाम को मच्छर सदा गुणगान करते हैं,
    जगत के उस नियन्ता को, सदा प्रणाम करते हैं।
    मगर इन्सान है खुदगर्ज कितना आज के युग में ,
    विपत्ति जब सताती है, नमन शैतान करते है।।

    बहुत कड़वा यथार्थ बयान किया है आपने ---शुभकामनायें।
    पूनम

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत ही सार्थक और सामयिक रचना---हार्दिक शुभकामनायें।
    हेमन्त कुमार

    उत्तर देंहटाएं
  9. मगर इन्सान है खुदगर्ज कितना आज के युग में ,
    विपत्ति जब सताती है, नमन शैतान करते है।।

    -शानदार यथार्थ...

    उत्तर देंहटाएं
  10. मन से न सही

    मुंह से आवाज

    तो करते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  11. gyan diya jisne ,pran bhare jisne
    hum bhi usi ko naman karte hain

    ek bahut hi sukhdayi aur prerak rachna.

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहाई ज्ञान की गंगा, मधुरता ईख में कर दी,
    कभी गर्मी, कभी वर्षा, कभी कम्पन भरी सरदी।
    किया है रात को रोशन, दिये हैं चाँद और तारे,
    अमावस को मिटाने को, दियों में रोशनी भर दी।।

    बहुत खूब ......... बहुत ही लय में और गीत की तरह गुनगुनाए जा सकती है आपकी ये लाजवाब रचना ..... अनुपम कृति .....

    उत्तर देंहटाएं

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