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रविवार, 13 दिसंबर 2009

"अब तो मिलनें में भी लगे पहरे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



हले पाबन्दियाँ थीं हँसने में,
अब तो रोने में भी लगे पहरे।
पहले बदनामियाँ थीं कहने में,
अब तो सहने में भी लगे पहरे।


कितने पैबन्द हैं लिबासों में,
जिन्दगी बन्द चन्द साँसों मे,
पहले हदबन्दियाँ थीं चलने में,
अब ठहरने में भी लगे पहरे।


शूल बिखरे हुए हैं राहों मे,
नेक-नीयत नहीं निगाहों में
पहले थीं खामियाँ सँवरने में,
अब उजड़ने में भी लगे पहरे।


अब हवाएँ जहर उगलतीं हैं,
अब फिजाएँ कहर उगलतीं हैं,
पहले गुटबन्दियाँ थीं कुनबे में,
अब तो मिलनें में भी लगे पहरे।


14 टिप्‍पणियां:

  1. शूल बिखरे हुए हैं राहों मे,
    नेक-नीयत नहीं निगाहों में
    पहले थीं खामियाँ सँवरने में,
    अब उजड़ने में भी लगे पहरे।

    बहुत सुंदर पंक्तियों के साथ....बेहतरीन रचना....

    उत्तर देंहटाएं
  2. अब हवाएँ जहर उगलतीं हैं,
    अब फिजाएँ कहर उगलतीं हैं,
    पहले गुटबन्दियाँ थीं कुनबे में,
    अब तो मिलनें में भी लगे पहरे।
    बहुत सुन्दर रचना सर . बिलकुल सामयिक है . आभार

    उत्तर देंहटाएं
  3. अब हवाएँ जहर उगलतीं हैं,
    अब फिजाएँ कहर उगलतीं हैं,
    पहले गुटबन्दियाँ थीं कुनबे में,
    अब तो मिलनें में भी लगे पहरे।
    सच्चाई की रोशनी दिखाती आपकी बात हक़ीक़त बयान करती है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. पहले गुटबन्दियाँ थीं कुनबे में,
    अब तो मिलनें में भी लगे पहरे।

    यथार्थ को दर्शाती रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  5. "पहले थीं खामियाँ सँवरने में,
    अब उजड़ने में भी लगे पहरे"।

    oh! ye kaisa daur he?

    उत्तर देंहटाएं
  6. शूल बिखरे हुए हैं राहों मे,
    नेक-नीयत नहीं निगाहों में
    पहले थीं खामियाँ सँवरने में,
    अब उजड़ने में भी लगे पहरे....

    बहुत लाजवाब शास्त्री जी ..... कमाल का लिखा है आपने ........ आज का चित्रण .....

    उत्तर देंहटाएं
  7. बदलते परिवेश को दर्शाती रचना

    उत्तर देंहटाएं
  8. कितने पैबन्द हैं लिबासों में,
    जिन्दगी बन्द चन्द साँसों मे,
    पहले हदबन्दियाँ थीं चलने में,
    अब ठहरने में भी लगे पहरे।
    बहुत सुंदर पंक्तियाँ ..बेहतरीन अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  9. पहले गुटबन्दियाँ थीं कुनबे में,
    अब तो मिलनें में भी लगे पहरे।


    -कितना सच!!!

    उत्तर देंहटाएं

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