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गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

"जी हाँ मैं नारी हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

नारी की व्यथा

मैं
धरती माँ की बेटी हूँ
इसीलिए तो
सीता जैसी हूँ
मैं हूँ
कान्हा के अधरों से
गाने वाली मुरलिया,
इसीलिए तो
गीता जैसी हूँ।

मैं
मन्दालसा हूँ,
जीजाबाई हूँ
मैं
पन्ना हूँ,
मीराबाई हूँ।

जी हाँ
मैं नारी हूँ,
राख में दबी हुई
चिंगारी हूँ।

मैं पुत्री हूँ,
मैं पत्नी हूँ,
किसी की जननी हूँ
किसी की भगिनी हूँ।

किन्तु
आज लोगों की सोच
कितनी गिर गई है,
मानवता
कितनी मर गई है।

दुनिया ने मुझे
मात्र अबला मान लिया है,
और केवल
भोग-विलास की
वस्तु जान लिया है!

यही तो है मेरी कहानी,
आँचल में है दूध
और आँखों में पानी!

15 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर, शास्त्री जी क्रिसमस की शुभकामनाये !

    उत्तर देंहटाएं
  2. अच्छी सार्थक रचना, शास्त्री जी।
    नारी के प्रति दुनिया को अब बदलना पड़ेगा क्योंकि नारी अब उतनी अबला नहीं रही।
    हमारा भी यही फ़र्ज़ है की हम अपनी बेटियों को सशक्त बनायें।

    उत्तर देंहटाएं
  3. आँचल में है दूध
    और आँखों में पानी!
    यही तो बिडम्बना है.
    बहुत सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत भावपूर्ण सुन्दर सार्थक रचना । लोगों की सोच को बदलना होगा |
    प्रकाम्या

    उत्तर देंहटाएं
  5. मैं पुत्री हूँ,
    मैं पत्नी हूँ,
    किसी की जननी हूँ
    किसी की भगिनी हूँ।
    बहुत सुंदर कविता

    उत्तर देंहटाएं
  6. इतिहास के पन्नों को फिर से उलटती हुई और नारी की महानता व्यक्त करती हुई बहुत बढ़िया गीत..बहुत बहुत बधाई शास्त्री जी सुंदर कविता..

    उत्तर देंहटाएं
  7. जी हाँ ...यही नारी है ...बहुत सुन्दर कविता ...आभार ...!!

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत अच्छी रचना। क्रिसमस पर्व की बहुत-बहुत शुभकामनाएं एवं बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  9. नारी सामाजिक स्थिति पर सटीक रचना

    उत्तर देंहटाएं

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