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रविवार, 20 दिसंबर 2009

"दो मुक्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


मुस्कराते रहो, गीत गाते रहो,
फूल बगिया में नूतन खिलाते रहो।
जाने वाला ही है अब यह साल तो,
प्रेम के दीप मन में जलाते रहो।।

रंज इस साल के साथ कर दो विदा,
मन की घाटी में गूँजे न ग़म की सदा।
आने वाला है नव-वर्ष खुशियों भरा,
कहने वाले पुरातन को हम अलविदा।।

13 टिप्‍पणियां:

  1. मुस्कराते रहो, गीत गाते रहो,
    फूल बगिया में नूतन खिलाते रहो।
    जाने वाला ही है अब यह साल तो,
    प्रेम के दीप मन में जलाते रहो।।


    बहुत सुंदर पंक्तियाँ....

    सुंदर कविता....

    उत्तर देंहटाएं
  2. नये वर्ष पर बहुत सुंदर संदेश है

    उत्तर देंहटाएं
  3. कहने वाले पुरातन को हम अलविदा।।
    अलविदा कहना ही होगा
    सुन्दर आशावाद

    उत्तर देंहटाएं
  4. रंज इस साल के साथ कर दो विदा,
    मन की घाटी में गूँजे न ग़म की सदा।

    बहुत बढ़िया बात कही है आपने शास्त्री जी!

    उत्तर देंहटाएं
  5. शास्त्री जी बहुत सुंदर कविता, जाते हुये साल को अलविदा कहने का निरला तरीका.
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  6. रंज इस साल के साथ कर दो विदा,
    मन की घाटी में गूँजे न ग़म की सदा।
    आने वाला है नव-वर्ष खुशियों भरा,
    कहने वाले पुरातन को हम अलविदा।।

    वाह, काश ऐसा ही हो !

    उत्तर देंहटाएं
  7. waah waah.........bahut hi zabardast andaz mein vida kar rahe hain saal ko.

    उत्तर देंहटाएं
  8. हमेशा की तरह एक बार फिर सुन्दर रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  9. वाह शाश्त्री जी, बहुत लाजवाब बात कही आपने.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं

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