"दो मुक्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
मुस्कराते रहो, गीत गाते रहो, फूल बगिया में नूतन खिलाते रहो। जाने वाला ही है अब यह साल तो, प्रेम के दीप मन में जलाते रहो।। रंज इस साल के साथ कर दो विदा, मन की घाटी में गूँजे न ग़म की सदा। आने वाला है नव-वर्ष खुशियों भरा, कहने वाले पुरातन को हम अलविदा।। |
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13 comments:
मुस्कराते रहो, गीत गाते रहो,
फूल बगिया में नूतन खिलाते रहो।
जाने वाला ही है अब यह साल तो,
प्रेम के दीप मन में जलाते रहो।।
बहुत सुंदर पंक्तियाँ....
सुंदर कविता....
नये वर्ष पर बहुत सुंदर संदेश है
कहने वाले पुरातन को हम अलविदा।।
अलविदा कहना ही होगा
सुन्दर आशावाद
शानदार
रंज इस साल के साथ कर दो विदा,
मन की घाटी में गूँजे न ग़म की सदा।
बहुत बढ़िया बात कही है आपने शास्त्री जी!
शास्त्री जी बहुत सुंदर कविता, जाते हुये साल को अलविदा कहने का निरला तरीका.
धन्यवाद
बहुत सुंदर मुक्तक।
रंज इस साल के साथ कर दो विदा,
मन की घाटी में गूँजे न ग़म की सदा।
आने वाला है नव-वर्ष खुशियों भरा,
कहने वाले पुरातन को हम अलविदा।।
वाह, काश ऐसा ही हो !
waah waah.........bahut hi zabardast andaz mein vida kar rahe hain saal ko.
हमेशा की तरह एक बार फिर सुन्दर रचना.
वाह शाश्त्री जी, बहुत लाजवाब बात कही आपने.
रामराम.
बहुत सुंदर कविता
bahut sunder muktak...
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