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सोमवार, 28 दिसंबर 2009

पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।।

ग़म की रखवाली करते-करते ही उम्र तमाम हुई।


पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।।


सुख आये थे संग में रहने.


डाँट-डपट कर भगा दिया,


जाने अनजाने में हमने,


घर में ताला लगा लिया,


पवन-बसन्ती दरवाजों में, आने में नाकाम हुई।


पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।।


मन के सुमन चहकने में है,


अभी बहुत है देर पड़ी,


गुलशन महकाने को कलियाँ,


कोसों-मीलों दूर खड़ीं,


हठधर्मी के कारण सारी आशाएँ हलकान हुई।


पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।।


चाल-ढाल है वही पुरानी,


हम तो उसी हाल में हैं,


जैसे गये साल में थे,


वैसे ही नये साल में हैं,


गुमनामी के अंधियारों में, खुशहाली परवान हुई।


पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।।

20 टिप्‍पणियां:

  1. चाल-ढाल है वही पुरानी,

    हम तो उसी हाल में हैं,

    जैसे गये साल में थे,

    वैसे ही नये साल में हैं,

    आम आदमी पर कोई फर्क नही पड़ता , साल नया हो या पुराना

    उत्तर देंहटाएं
  2. "चाल-ढाल है वही पुरानी,

    हम तो उसी हाल में हैं,

    जैसे गये साल में थे,

    वैसे ही नये साल में हैं,"

    बहुत अच्छी पंक्तियाँ हैं , सच आम आदमी को कोई फर्क नहीं पड़ता !!

    उत्तर देंहटाएं
  3. गुमनामी के अंधियारों में, खुशहाली परवान हुई।

    पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।।

    बहुत खूब, सुन्दर रचना शास्त्री जी !

    उत्तर देंहटाएं
  4. हठधर्मी के कारण सारी आशाएँ हलकान हुई।
    पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।।
    हठ्धर्मी और नादानी ही तो है जिसके कारण हम ताउम्र परेशान होते रहते हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर लगी आप की यह रचना, हम भि मोला मस्त है, नया पुराना सब एक समान है, बस केलेंडर बदल जाता है

    उत्तर देंहटाएं
  6. मन के सुमन चहकने में है,
    अभी बहुत है देर पड़ी,
    गुलशन महकाने को कलियाँ,
    कोसों-मीलों दूर खड़ीं,

    sundar bhavon se saji behad khubsurat rachana..bahut badhiya lagi naye saal ke aagman me yah sundar rachana..badhai

    उत्तर देंहटाएं
  7. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  8. सुन्दर - हम भी निरर्थक की रखवाली करते जिन्दगी गुजारे गये हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत अच्छी रचना। बहुत-बहुत धन्यवाद
    आपको नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत सुंदर पंक्तियों के साथ ...सुंदर रचना....

    उत्तर देंहटाएं
  11. पवन-बसन्ती दरवाजों में, आने में नाकाम हुई।

    पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।।

    बहुत सुंदर.

    उत्तर देंहटाएं
  12. गुमनामी के अंधियारों में, खुशहाली परवान हुई।

    पहरेदारी करते-करते सुबह हुई और शाम हई।।

    बहुत बढिया लगी ये रचना....
    आभार्!

    उत्तर देंहटाएं
  13. बहुत उम्दा!!

    यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि आप हिंदी में सार्थक लेखन कर रहे हैं।

    हिन्दी के प्रसार एवं प्रचार में आपका योगदान सराहनीय है.

    मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

    नववर्ष में संकल्प लें कि आप नए लोगों को जोड़ेंगे एवं पुरानों को प्रोत्साहित करेंगे - यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

    निवेदन है कि नए लोगों को जोड़ें एवं पुरानों को प्रोत्साहित करें - यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

    वर्ष २०१० मे हर माह एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाएँ और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।

    आपका साधुवाद!!

    नववर्ष की अनेक शुभकामनाएँ!

    समीर लाल
    उड़न तश्तरी

    उत्तर देंहटाएं
  14. बहुत अच्छी कविता।
    आने वाला साल मंगलमय हो।

    उत्तर देंहटाएं
  15. बहुत खूब मयंक जी आप कविता की इन लाय्नो ने ही सब कुछ बयाँ कर दिया ,,

    चाल-ढाल है वही पुरानी,

    हम तो उसी हाल में हैं,

    जैसे गये साल में थे,

    वैसे ही नये साल में हैं,
    नव वर्ष पर इतनी बेहतरीन कविता के लिए आप को बधाई और नव वर्ष की अग्रिम हार्दिक शुभ कामनाये
    सादर
    प्रवीण पथिक
    997196984

    उत्तर देंहटाएं
  16. चाल-ढाल है वही पुरानी,

    हम तो उसी हाल में हैं,

    जैसे गये साल में थे,

    वैसे ही नये साल में हैं,

    hmm.. purn satya

    उत्तर देंहटाएं

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