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शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

"मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

जंगलों में जब दरिन्दे आ गये।
मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।


पूछते हैं वो दर-ओ-दीवार से,
आदमी महरूम क्यों है प्यार से?
क्यों दिलों में भाव गन्दे आ गये?
मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।


हो गया क्यों बे-रहम इन्सान है?
हो गया नीलाम क्यों ईमान है?
हबस के बहशी पुलिन्दे आ गये।
मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।


जुल्म की हम छाँव में हैं जी रहे,
जहर को अमृत समझकर पी रहे,
हमको भी कुछ दाँव-फन्दे आ गये।


मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।


24 टिप्‍पणियां:

  1. यही तो है आज की कडवी सच्चाई,
    अच्छी रचना के लिए लीजिये बधाई |

    उत्तर देंहटाएं
  2. पूछते हैं वो दर-ओ-दीवार से,
    आदमी महरूम क्यों है प्यार से?
    क्यों दिलों में भाव गन्दे आ गये?
    मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।

    ek katu satya ko shabd de diye........sach jeena kitna muhal ho gaya hai.

    उत्तर देंहटाएं
  3. पूछते हैं वो दर-ओ-दीवार से,
    आदमी महरूम क्यों है प्यार से?
    क्यों दिलों में भाव गन्दे आ गये?
    मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।

    सच मे आज हम संवेदनहीन होते जा रहे हैं बहुत सुन्दर रचना है बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  4. हो गया क्यों बे-रहम इन्सान है?

    हो गया नीलाम क्यों ईमान है?

    हबस के बहशी कुबन्दे आ गये।

    मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।

    समसामयिक रचना...सच्चाई को बयां करती हुई .....बहुत अच्छी लगी

    उत्तर देंहटाएं
  5. आज के हालात को बयान करती सुन्दर कविता के लिए बधाई !

    उत्तर देंहटाएं
  6. हो गया क्यों बे-रहम इन्सान है?

    हो गया नीलाम क्यों ईमान है?

    हबस के बहशी पुलिन्दे आ गये।

    मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।
    बहुत सुन्दर, लाजबाब शास्त्री जी !

    उत्तर देंहटाएं
  7. हो गया क्यों बे-रहम इन्सान है?

    हो गया नीलाम क्यों ईमान है?

    हबस के बहशी पुलिन्दे आ गये।

    मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।
    रचना अच्छी लगी।

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुन्दर रचना है।बधाइ।

    जुल्म की हम छाँव में हैं जी रहे,
    जहर को अमृत समझकर पी रहे,
    हमको भी कुछ दाँव-फन्दे आ गये।
    मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।

    उत्तर देंहटाएं
  9. पूछते हैं वो दर-ओ-दीवार से,

    आदमी महरूम क्यों है प्यार से?

    क्यों दिलों में भाव गन्दे आ गये?

    मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।

    sahi baat kahi hai....badhiya rachna.

    उत्तर देंहटाएं
  10. जंगलों में जब दरिन्दे आ गये।
    मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।

    बहुत सुन्दर रचना, शास्त्री जी. धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  11. आपको नए साल (हिजरी 1431) की मुबारकबाद !!!

    उत्तर देंहटाएं
  12. कडवी सच्चाई के साथ ... बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति..........

    उत्तर देंहटाएं
  13. शास्त्रीजी,
    सुन्दर रचना ! साधुवाद !!
    'जंगलों में जब दरिन्दे आ गये।
    मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।'
    क्या जंगल, क्या शहर--दरिन्दे तो सारी धरती पर पांव पसार चुके है ! लेकिन इस रचना में आपका इशारा समझ रहा हूँ !
    सदर--आ.

    उत्तर देंहटाएं
  14. जंगल में आशियाना का जब ख़तरा हुआ तो बेचारे फिर से क़ैद में ही रहना पसंद किए..इंसान और इंसान के चारो ओर के वातावरण पर प्रकाश डालती आज के परिवेश की व्याख्या करती बहुत बढ़िया गीत..धन्यवाद शास्त्री जी

    उत्तर देंहटाएं
  15. जंगलों के दरिंदो से भाग कर परिंदे आपके घर में आ गए ...
    सही सुरक्षित ठिकाना पा गए ...!!

    उत्तर देंहटाएं
  16. पूछते हैं वो दर-ओ-दीवार से,
    आदमी महरूम क्यों है प्यार से?
    क्यों दिलों में भाव गन्दे आ गये?
    मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।

    बहुत ही गहराई लिये हुये भावों के साथ बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

    उत्तर देंहटाएं
  17. शास्त्री जी,

    क्या सधी हुई रचना है... विचारों को झकझोरती हुई

    पूछते हैं वो दर-ओ-दीवार से,
    आदमी महरूम क्यों है प्यार से?
    क्यों दिलों में भाव गन्दे आ गये?
    मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।

    वाह!! वह मनुष्य ही था जिसने एक परिंदे की वेदना से मुखरित हो पहला महाकाव्य लिख डाला. आज इन्ही परिंदों का उदाहरण देकर आपने मनुष्य-ह्रदय की संवेदनाओं से मुखातिब हैं सुन्दर !!

    उत्तर देंहटाएं
  18. हो गया क्यों बे-रहम इन्सान है?
    हो गया नीलाम क्यों ईमान है?
    हबस के बहशी पुलिन्दे आ गये।
    मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये ....

    जाने कब हम इंसान . .......... कब पत्थर टूटेंगे ...........

    उत्तर देंहटाएं
  19. कल 10/05/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं

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