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शनिवार, 19 दिसंबर 2009

"सुखी जीवन का मन्त्र" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

बे- मन का तन
तोते का जीवन
---------------------------
फाके मस्ती में भी
रहता था परिवार के संग
हमेशा ही लड़ता था
मेहनत की जंग
उड़ता था 
ऊँची-ऊँची उड़ान
कभी नही होती थी
थकान
----------------------------
जाता था 
कभी रेगिस्तानी रेत में
आता था 
कभी धान के खेत में
चखता था
कभी खट्टे मीठे आम
यही था मेरा
रोजमर्रा का काम
----------------------------
एक दिन मैं
बहेलिए को भा गया
लालचवश्
उसके जाल  मे आ गया
उसने मुझे बेच दिया
एक धनी साहुकार को
अब मैं तरसता था
परिवार के प्यार को
चाँदी का घर था
सोने का आसन था
बिना श्रम के
बढ़िया भोजन था
खाने को
दुर्लभ व्यञ्जन  थे
रुचिकर पकवान थे
लेकिन
आजादी न थी
सभी मुझे 
करते थे प्यार
हमेशा करते थे
मेरी मनुहार
-----------------------------
अगर कुछ नही था
तो वह था
अपनों का निश्छल प्यार
सुख का जीवन भी 
बन गया था भार
------------------------------
अब में हो गया हूँ
कृश्-काय
दुर्बल
बहुत ही असहाय
देता हूँ
यह सन्देश
यही है मेरा 
अन्तिम उपदेश
------------------------------
कभी भी नही होना 
परतन्त्र!
यही है सुखी जीवन का
मन्त्र!
-------------------------------

21 टिप्‍पणियां:

  1. कभी भी नही होना
    परतन्त्र!
    यही है सुखी जीवन का
    मन्त्र!


    सत्य बात.... बहुत अच्छी लगी यह कविता....

    उत्तर देंहटाएं
  2. कभी भी नही होना
    परतन्त्र!
    यही है सुखी जीवन का
    मन्त्र!
    _________________________________
    वाह क्या बेहतरीन सुखी जीवन का मंत्र दिया
    सभी के सुखी जीवन की कामना का शुक्रिया

    उत्तर देंहटाएं
  3. यही है जीवन का सार.


    धन्‍यवाद शास्‍त्री जी.

    उत्तर देंहटाएं
  4. कभी भी नही होना
    परतन्त्र!
    यही है सुखी जीवन का
    मन्त्र!

    paradheen sapnehun sukh nahin...........bilkul sahi kaha..........bahut hi sundar dhang se chitrit kiya hai.

    उत्तर देंहटाएं
  5. अगर कुछ नही था
    तो वह था
    अपनों का निश्छल प्यार
    सुख का जीवन भी
    बन गया था भार
    कविता के माध्यम से सुन्दर सन्देश !

    उत्तर देंहटाएं
  6. पराधीन होने में कभी भी सुख नहीं मिलता. सत्य वचन.

    उत्तर देंहटाएं
  7. कभी भी नही होना
    परतन्त्र!
    वाकई इससे बडा दुख तो है नही

    उत्तर देंहटाएं
  8. आप ने कविता मे बहुत सुंदर बात कह दी.
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  9. अपने अनुभव से सच्चा
    मंत्र दिया आपने.

    - सुलभ

    उत्तर देंहटाएं
  10. शास्त्री जी,

    कभी भी नही होना परतन्त्र!
    यही है सुखी जीवन का मन्त्र!

    सत्य वचन....वैसे भी कहते हैं "पराधीन सपनेहु सुख नाहि!!"

    उत्तर देंहटाएं
  11. कभी भी नही होना
    परतन्त्र!
    यही है सुखी जीवन का
    मन्त्र!
    - हिन्दुस्तान स्वतंत्र हो कर भी सुखी जीवन का मन्त्र नहीं सीख पाया.अब धीरे धीरे आर्थिक परतंत्रता की ओर अग्रसर हो रहा है.

    उत्तर देंहटाएं
  12. कभी भी नही होना
    परतन्त्र!
    यही है सुखी जीवन का
    मन्त्र!...

    इस माध्यम से आपने जीवन मंत्र दे दिया ..... सुदार रचना है शास्त्री जी .......

    उत्तर देंहटाएं
  13. पिंजरा, कहीं तोते को मनुष्‍य की नकल की सजा तो नहीं.

    उत्तर देंहटाएं
  14. कल 04/05/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं

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