"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

"अचरज में है हिन्दुस्तान!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

खादी और खाकी दोनों में बसते हैं शैतान।
अचरज में है हिन्दुस्तान! अचरज में है हिन्दुस्तान!!


तन भूखा है, मन रूखा है खादी वर्दी वालों का,
सुर तीखा है, उर सूखा है खाकी वर्दी वालों का,
डर से इनके सहमा-सहमा सा मजदूर-किसान!
अचरज में है हिन्दुस्तान! अचरज में है हिन्दुस्तान!!


खुले साँड संसद में चरते, करते हैं मक्कारी,
बेकसूर थानों  में मरते, जनता है दुखियारी,
कितना शानदार नारा है, भारत बहुत महान!
अचरज में है हिन्दुस्तान! अचरज में है हिन्दुस्तान!!


माली लूट रहे हैं बगिया को बन करके सरकारी,
आलू,दाल-भात महँगा है, महँगी हैं तरकारी,
जीने से मरना महँगा है, आफत में इन्सान!
अचरज में है हिन्दुस्तान! अचरज में है हिन्दुस्तान!!


मानवता-मर्यादा घुटती है खादी के बानों मे,
अबलाओं की लज्जा लुटती है सरकारी थानों में,
खादी, खाकी की केंचुलियाँ, सचमुच हैं वरदान!
अचरज में है हिन्दुस्तान! अचरज में है हिन्दुस्तान!!

10 टिप्‍पणियां:

  1. खादी और खाकी दोनों में बसते हैं शैतान।अचरज में है हिन्दुस्तान! अचरज में है हिन्दुस्तान!!


    bilkul sahi kaha..........jo bhi insaan hai wo achraj mein hai.........bahut hi satik.

    उत्तर देंहटाएं
  2. खुले साँड संसद में चरते, करते हैं मक्कारी,
    बेकसूर थानों में मरते, जनता है दुखियारी,
    कितना शानदार नारा है, भारत बहुत महान!
    अचरज में है हिन्दुस्तान! अचरज में है हिन्दुस्तान!!

    हा-हा-हा, दिल की बात ! बहुत सुन्दर !

    उत्तर देंहटाएं
  3. शास्त्रीजी, खादी तो ठीक है क्योंकि वह सार्वभौमिक सर्वदलीय, सार्वजनिक है; परन्तु आपका खाकी प्रयोग निज़ी -लिप्तता व वर्ग विशेष के प्रति अरुचि दर्शाता है जिससे कवि- साहित्यकार को बचना चाहिये क्योंकि वह,एक प्रज़ातन्त्र, भारत देश की जनता के एक वर्ग का प्रतिनिधि है, और आप जनता के एक वर्ग को शैतान नहीं कहसकते चाहे वह आपके विपरीत विचारों वाला क्यों न हो ।
    हालांकि खादी वाले भी आपके ही भेजे हुए हैं, आपके प्रतिनिधि। दूसरे को गाली देने की स्वयम अपने आप में न दखने की हमे आदत पड गई है, -पर उपदेश कुशल बहुतेरे’। आखिर आप किसे शैतान कहरहे हैं ---सोचें । कुछ सार्थक समाधान पूर्ण रचना करें- भेड-चाल नहीं।

    उत्तर देंहटाएं
  4. डॉ.श्याम जी!
    आपकी बात को गलत तो नही कह सकता हूँ, क्योंकि मेरे भी परिवार से खादी और खाकी वाले बहुत हैं।
    लेकिन जब एक मछली तालाब को गन्दा कर सकती है तो जहाँ 99.99 प्रतिशत मछलियाँ गन्दी हैं तो आप क्या कहेंगे?
    यदि आप आदेश करें तो अभिव्यक्ति की आजादी छोड़कर जबान मं ताला डाल कर बैठ जाऊँ?

    उत्तर देंहटाएं
  5. आइना दिखा रही है ये रचना दोनों को

    उत्तर देंहटाएं
  6. अबलाओं की लज्जा लुटती सरकारी थानों में,
    यही तो बिडम्बना है

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails