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शनिवार, 12 दिसंबर 2009

"उन्हें खाना नहीं आता हमें पीना नहीं आता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

ज रद्दी छाँट रहा था तो उसमें 
यह एक पुरानी रचना मिल गई-


उन्हें गाना नहीं आता हमें रोना नहीं आता।
उन्हें चलना नहीं आता हमें ढोना नहीं आता।।


बहुत मजबूर हैं वो भी बहुत मजबूर हैं हम भी,
उन्हें जगना नहीं आता हमें सोना नहीं आता।
उन्हें चलना नही आता हमें ढोना नहीं आता।।


बहुत मगरूर हैं वो भी, बहुत मगरूर हैं हम भी,
उन्हें पाना नहीं आता हमें खोना नहीं आता।
उन्हें चलना नहीं आता हमें ढोना नहीं आता।।


बहुत मशहूर हैं वो भी, नशे में चूर हैं हम भी,
उन्हें जादू नहीं आता, हमें टोना नहीं आता।
उन्हें चलना नहीं आता हमें ढोना नहीं आता।।


खुदा का नूर हैं वो भी, नहीं बेनूर हैं हम भी,
उन्हें मरना नहीं आता, हमें जीना नहीं आता।
उन्हें चलना नहीं आता हमें ढोना नहीं आता।।


मिल नहीं सकती कभी भी रेल की दो पटरियाँ,
उन्हें खाना नहीं आता हमें पीना नहीं आता।
उन्हें चलना नहीं आता हमें ढोना नहीं आता।।


13 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी लगी यह पुरानी रचना ....

    उत्तर देंहटाएं
  2. नहीं मिलती कभी भी रेल की हैं पटरियाँ दोनों,

    उन्हें खाना नहीं आता हमें पीना नहीं आता।



    शानदार

    उत्तर देंहटाएं
  3. SACH KI KAVITA H
    MUBARAK PURANI KAVITA KE MILNE PAR
    HUM JAISO KO BHI ... PURANA KUCHH TO MILA
    AAJ YUG MEIN SAB KO SAB NAYA CHAHIYE.
    HUME PURANA JAYADA ACHCHHA LAGA

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत मगरूर हैं वो भी, बहुत मगरूर हैं हम भी,
    उन्हें पाना नहीं आता हमें खोना नहीं आता।
    shandaar lines.. kya khuddari hai... wah!

    खुदा का नूर हैं वो भी, नहीं बेनूर हैं हम भी,
    उन्हें मरना नहीं आता, हमें जीना नहीं आता।
    destructive interference ho gaya ye to...

    मिल नहीं सकती कभी भी रेल की दो पटरियाँ,
    उन्हें खाना नहीं आता हमें पीना नहीं आता।
    bahut hi sundar panktiyan...
    mujhe apni ek triveni aur sangeeta puri ji ka comment yaad aa gaya...
    maine likha tha..
    चलते रहे सीधी लाइन पर,
    लिए मन में पुनर्मिलन की आस,
    हम दोनों की ज्यामिति कमजोर थी...
    sangeeta puri ji ne kaha...
    दोनो की ज्‍यामिति कुछ कमजोर तो हैं .. पर पूरी नहीं .. समानांतर रेखाएं भी अनंत में जाकर मिलती है !!

    shandaar lagi aapki ye purani rachna...

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह वाह । बहुत खूब ।
    बहुत मगरूर हैं वो भी, बहुत मगरूर हैं हम भी,
    उन्हें पाना नहीं आता हमें खोना नहीं आता।

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपके माथे से छलके जो पसीना भी कहीं
    आसमां हिलने लगे और कांप उठे ये ज़मीन
    आपका तो ये पसीना खून से भी कीमती
    और अपने खून की कीमत यहां कुछ भी नहीं
    अपना तो खून पानी, जीना मरना बेमानी
    वक्त की हर अदा है अपनी देखी-भाली
    आपका क्या होगा जनाबे-आली...

    जय हिंद...

    उत्तर देंहटाएं
  7. उन्हें चलना नहीं आता हमें ढोना नहीं आता।।

    उत्तर देंहटाएं
  8. बस, इन्हीं पंक्तियों में एक समूचा जीवनदर्शन आपने कह डाला है...

    उत्तर देंहटाएं
  9. और छांटिये...

    बढ़िया रचना निकली..

    उत्तर देंहटाएं
  10. पुरानी रचना और नया टेम्पलेट दोनो ही जानदार हैं, बधाई, पुराना टे्म्पलेट खुलने मे ज्यादा समय लेता था ये नया वाला ठीक है,बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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