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बुधवार, 6 अप्रैल 2011

"सौम्य सरोवर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


 
गीत और ग़ज़लों वाला जो सौम्य सरोवर है।
इसमें मन के अनुभावों की छिपी धरोहर है।।

शब्द हिलोरें लेते जब भी मेरी रीती सी गागर में,
देता हूँ उनको उडेल मैं, धारा बन करके सागर में,
उच्चारण में ठहर गया जीवन्त कलेवर है।
इसमें मन के अनुभावों की छिपी धरोहर है।।

पगडण्डी है वही पुरानी, जिसको मैंने अपनाया है,
छंदों का संसार सनातन, मेरे मन को ही भाया है,
छल-छल, कल-कल करती गंगा बहुत मनोहर है।
इसमें मन के अनुभावों की छिपी धरोहर है।।

पर्वत मालाएँ फैली हैं, कितनी धरा-धरातल पर,
किन्तु हिमालय जैसा कोई, नज़र न आता भूतल पर,
जो अरिदल से रक्षा करता वही महीधर है।
इसमें मन के अनुभावों की छिपी धरोहर है।।

बेच रहे ऊँचे दामों में, स्वादहीन पकवानों को,
शिक्षा की बोली लगती है, ऊँचे भव्य मकानों में,
जो देता है जीवन सबको, वही पयोधर है।
इसमें मन के अनुभावों की छिपी धरोहर है।। 

16 टिप्‍पणियां:

  1. बेच रहे ऊँचे दामों में, स्वादहीन पकवानों को,
    शिक्षा की बोली लगती है, ऊँचे भव्य मकानों में,
    जो देता है जीवन सबको, वही पयोधर है।
    इसमें मन के अनुभावों की छिपी धरोहर है।।
    ati sunder

    उत्तर देंहटाएं
  2. पगडण्डी है वही पुरानी, जिसको मैंने अपनाया है,
    छंदों का संसार सनातन, मेरे मन को ही भाया है,

    हमको भी यह पगडण्डी, अब सबसे अधिक सुहाती है।
    जब भी खोता तनहाई में, चुपके से आ जाती है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. आप लाभदायक जानकारी देते हैं .
    आज आपके ब्लॉग का लिंक 'ब्लॉग कि ख़बरें' ब्लॉग पर लगाया जा रहा है .
    http://blogkikhabren.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेच रहे ऊँचे दामों में, स्वादहीन पकवानों को,
    शिक्षा की बोली लगती है, ऊँचे भव्य मकानों में,
    जो देता है जीवन सबको, वही पयोधर है।
    इसमें मन के अनुभावों की छिपी धरोहर है।।

    ..बहुत भावमयी सुन्दर गीत...आभार

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी हर कृति पहले से और अच्छी लगती है..

    उत्तर देंहटाएं
  6. बेच रहे ऊँचे दामों में, स्वादहीन पकवानों को,
    शिक्षा की बोली लगती है, ऊँचे भव्य मकानों में,
    जो देता है जीवन सबको, वही पयोधर है।
    इसमें मन के अनुभावों की छिपी धरोहर है।।

    सामजिक सरोकारों को भी आप भूलते नहीं ...सुन्दर गीत ..

    उत्तर देंहटाएं
  7. शब्द हिलोरें लेते जब भी मेरी रीती सी गागर में,
    देता हूँ उनको उडेल मैं, धारा बन करके सागर में,
    उच्चारण में ठहर गया जीवन्त कलेवर है।
    इसमें मन के अनुभावों की छिपी धरोहर है।।

    अरे इसमे इतना दर्द क्यों है…………जीवन्त कलेवर कैसे ठहरा रहे हैं…………बस मन के भावो को शब्द देते रहिये।
    सुन्दर रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत प्यारा गीत है .
    और ये पंक्तियाँ तो कमाल कर गयीं.
    शब्द हिलोरें लेते जब भी मेरी रीती सी गागर में,
    देता हूँ उनको उडेल मैं, धारा बन करके सागर में,

    उत्तर देंहटाएं

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