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शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

"दुनियाभर में मित्र बनाना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


चला सैर को नीलगगन की,
पंछी सा गतिमान हो रहा।
मस्त उड़ानें देख-देखकर,
हमको गर्व-गुमान हो रहा।।,
रेंगा पहले यह धरती पर,
फिर उठ गया धरा से ऊपर।
शोर मचाता आगे बढ़ता,
जैसे राजहंस अम्बर पर।।
द्वापर-त्रेता का घटनाक्रम,
कलियुग में साकार हो गया।
आवश्यकताएँ होने पर,
सम्भव आविष्कार हो गया।।

कितना सुखद-सरल लगता है,
दूर देश में आना-जाना।
,दुनियाभर में मित्र बनाना,
नहीं कठिन सम्बन्ध निभाना।।

17 टिप्‍पणियां:

  1. द्वापर-त्रेता का घटनाक्रम,
    कलियुग में साकार हो गया।
    आवश्यकताएँ होने पर,
    सम्भव आविष्कार हो गया।।


    बहुत सुन्दर, विमान को बस एक ही बात का मलाल रहता है कि वह रॉकेट की तरह सीधे ऊपर नहीं जा पाटा, यानी उड़ने के लिए उसे दौड़ना पड़ता है ! :)

    उत्तर देंहटाएं
  2. Nice post.
    हरेक आदमी को सोचना चाहिए कि समाज में उसकी क्या पहचान है ?
    उसे किस तरह के सुधार की ज़रुरत है ?
    बेहतर व्यक्तित्व और बेहतर समाज के निर्माण के लिए भी और अपनी संतुष्टि के लिए , हर तरह से यह बात लाजिमी है.


    दिल है ख़ुश्बू है रौशनी है मां
    अपने बच्चों की ज़िन्दगी है मां

    उत्तर देंहटाएं
  3. कितनी सुंदर हवाई जहाज की कविता ......

    उत्तर देंहटाएं
  4. आवश्यकताओं ने अविष्कारों को जन्म दिया ...
    सुन्दर रचना !

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुन्दर सन्देश देता बाल रचना

    उत्तर देंहटाएं
  6. वाह वाह बहुत सुन्दर कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  7. कितना सुखद-सरल लगता है,दूर देश में आना-जाना।,दुनियाभर में मित्र बनाना,नहीं कठिन सम्बन्ध निभाना।।

    एक उपलब्धि कि ख़ुशी का बोध कराती ......वाह....बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं

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