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शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

"हैं शहतूत बहुत गुण वाले" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

कितना सुन्दर और सजीला।
खट्टा-मीठा और रसीला।।


हरे-सफेद, बैंगनी-काले।
छोटे-लम्बे और निराले।।

शीतलता को देने वाले।
हैं शहतूत बहुत गुण वाले।।
पारा जब दिन का बढ़ जाता।
तब शहतूत बहुत मन भाता।

इसका वृक्ष बहुत उपयोगी।
ठण्डी छाया बहुत निरोगी।।

टहनी-डण्ठल सब हैं बढ़िया।
इनसे बनती हैं टोकरियाँ।।

रेशम के कीड़ों का पालन।
निर्धन को देता है यह धन।।


आँगन-बगिया में उपजाओ।
खेतों में शहतूत लगाओ।।

19 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब ... आखिर में सही सीख दी आपने ...!!

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  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. मुझे तो अभी खाने क दिल कर रहा है .

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  4. ज़माना हो गया शहतूत खाए ..

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  5. कुछ देर पहले आपकी तारीफ की और अब आपकी इस शहतूती रचना की..
    लेकिन मुझे इस की सन्टी से बहुत डर लगता था.. :)

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  6. जो भी शहतूत निशदिन खाए
    कब्ज रोग उसे कभी न सताए
    पर शास्त्री जी दुर्लभ होता जा रहा है शहतूत अब तो.
    आपने जो शानदार चित्र दिखाए ,उनसे तो पानी भर भर आ रहा है मुहँ में.

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  7. शहतूत महिमा पसंद आई.


    एक अरसा गुजर गया शहतूत देखे हुए.

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  8. शहतूत सी मीठी कविता |सुंदर चित्र और शहतूत का पेड़ लगाने की सीख |अच्छी पोस्ट पढ़वाने के लिए आभार |
    आशा

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  9. बहुत सुन्दर तस्वीरें ...
    जमाना हुआ इनका दर्शन किये !

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  10. कभी शहतूत का पेड़ हमारे घर में भी हुआ करता था और उसमें बहुत मीठे शहतूत आते थे लेकिन बाद में उसमें कीड़ा लग गया और खतरनाक हो जाने पर उसे हटाना पड़ा ! उसका मीठा स्वाद अभी तक जिह्वा में रचा बसा है ! बहुत उपयोगी एवं ज्ञानवर्धक रचना !

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  11. आपने तो मुझे बचपन में लौटने का सुअवसर दे दिया. आभार.

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  12. जितना शहतूत मीठा उतनी ही ये बालकविता भी मीठी है.

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  13. शायद बचपन मे ही खाये थे……………आनन्द आ गया देखकर और पढकर्।

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  14. शहतूती रचना की तारीफ कैसे करूँ ?बहुत खूब

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  15. प्रेरणादायी परिचय है इस कविता में.

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  16. वाह! मुंह में पानी आ गया शास्त्री जी ! पर हमारे बाम्बे में ये कम ही दीखते है --

    उत्तर देंहटाएं

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