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बुधवार, 27 अप्रैल 2011

"शिथिलतन-यवा मन की कविता" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मित्रों! आज एक पुरानी डायरी मेरे हाथ लग गई!
उसमें बहुत समय पहले की मेरी यह रचना लिखी हुई थी!
मुझे तो पसन्द नहीं आई, शायद आपको भी पसन्द न आये!
स्वर्गलोक से चलकर बाला,
मेरे पास चली आई।
उसकी चंचल-मादक मूरत,
थी मेरे मन को भी भाई।।

हँस-हँस कर वो स्वप्नसुन्दरी,
मुझसे बातें करती थी।
बहुत प्यार से आलिंगन कर,
बाँहों में वो भरती थी।।

मेरा भी मन मचल रहा था,
उसका आँचल पाने को।
उर में लड्डू फूट रहे थे,
अपना उसे बनाने को।।

चंचल अँखियों को मटकाना,
मुझको बहुत रिझाता था।
यह लगता था मेरा उससे,
जन्म-जन्म का नाता था।।

तभी एक सादी सी महिला,
आई करने को व्यवधान।
मुझको दर्पण दिखलाकर,
बोली-रे नर! हो सावधान।।

देख रंग में भंग, अप्सरा ने-
दिखलाया रूप विकट।
लहु को पीने को बड़े दाँत,
उसके मुख में हो गये प्रकट।।

देख भयानक दृश्य अचानक,
निद्रा से मैं जाग गया।
वृद्धावस्था में यौवन का,
शैतान निशाचर भाग गया।।

सपनों में कभी तुम्हारे जब,
रूपसी-भूतनी आ जाए।
निद्रा-तन्द्रा में बरबस ही,
यह दृश्य दृगों में छा जाए।।

मुखड़ा निस्तेज देख लेना,
दर्पण में एक बार अपना।
हो जाएगा आभास तभी,
यह सच था या केवल सपना।।

27 टिप्‍पणियां:

  1. हा हा हा ……………मज़ा आ गया पढकर ।
    एक नये अन्दाज़ की गुदगुदाती कविता दिल को भा गयी।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (28-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  3. रुपसी भुतनी का खूब अद्भुत विवेचन

    उत्तर देंहटाएं
  4. तभी एक सादी सी महिला,
    आई करने को व्यवधान।
    मुझको दर्पण दिखलाकर,
    बोली-रे नर! हो सावधान।।

    रंग में भंग !!! :)

    उत्तर देंहटाएं
  5. सच ही कभी कभी ख्वाब भी कितना डरा देते हैं ... अच्छा ख़ासा रंग जमा हुआ था ..सब तहस नहस हो गया ...बहुत पसंद आई रचना ..और सोचने पर भी विवश कर दिया

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत खूब ! हमें तो बहुत अच्छी लगी यह रचना..आभार

    उत्तर देंहटाएं
  7. aapne sapne ko kitne sunder sabdo me sawara he badhai man prasan ho gaya

    उत्तर देंहटाएं
  8. बेहद रोमांटिक.. युवा मन की कविता..

    उत्तर देंहटाएं
  9. हा हा हा .बहुत खूब .मजेदार भी रोमांटिक भी .

    उत्तर देंहटाएं
  10. एक खूबसूरत अभिव्यक्ति
    बहुत अच्छी लगी|
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  11. man to kabhi vradh nahi hota sapno par kisi ka koi jor nahi....bahut hi rochak lagi yeh kavita.

    उत्तर देंहटाएं
  12. आपको भले न आई हो..हमें तो पसंद आई...

    उत्तर देंहटाएं
  13. बहुत मस्त मज़ा आया आया पढ़ा के रोमाटिक भी हसी भी और वास्तविकता भी

    उत्तर देंहटाएं
  14. 'मुखड़ा निस्तेज देख लेना,दर्पण में एक बार अपना।हो जाएगा आभास तभी,यह सच था या केवल सपना।।'

    शास्त्रीजी सावन के अंधे को सब हरा हरा ही नजर आता है.केशवदास जी तो खीज कर कह उठते है
    'केशव केशन अस करि,जस अरिहु न कराहीं
    मृग लोचनी नव सुंदरी बाबा बाबा कहि कहि जाहि'

    शास्त्रीजी,यदि आपको यह कविता अच्छी न लगती होती तो छापते ही क्यूँ आप.लेकिन,बचाव का रास्ता तो अच्छा ढूंढा है आपने.
    माखन खा कर कृष्ण भी तो मैया से कहते हैं
    'मैया मेरी मै नहीं माखन खायो.'

    उत्तर देंहटाएं
  15. वाह शास्त्री जी बहुत ही मज़ेदार रचना लिखी है ...!!
    हमें भी अच्छी लगी

    उत्तर देंहटाएं
  16. पढ़कर अच्छा लगा मगर आपने इस पोस्ट में कोई फोटो नहीं लगाई???

    तीखे तड़के का जायका लें
    संसद पर एटमी परीक्षण

    उत्तर देंहटाएं
  17. आनन्द आ गया शास्त्री जी! दिल को गुदगुदा गई यह श्रंगार रस और वीभत्स रस में डूबी आपकी पुरानी डायरी की यह सजीव कविता --

    उत्तर देंहटाएं
  18. युवा मन के उद्गार या मन के युवा उद्गार।

    उत्तर देंहटाएं

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