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बुधवार, 20 अप्रैल 2011

"गजल और गीत क्या है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



गजल और गीत क्या है,
नहीं कोई जान पाया है।
हृदय की बात कहने को,
कलम अपना चलाया है।।

मिलन की जब घड़ी होती,
बिछुड़ जाने का गम होता,
 तभी पर्वत के सीने से,
निकलता  धार बन सोता,
उफनते भाव के नद को,
करीने से सजाया है।
हृदय की बात कहने को,
कलम अपना चलाया है।।

बिछाएँ हों किसी ने जब,
वफा की राह में काँटे,
लगीं हो दोस्ती में जब,
जफाओं की कठिन गाँठे,
दबे जज्बात कहने का,
बहाना हाथ आया है।
हृदय की बात कहने को,
कलम अपना चलाया है।।

चमन में जब कभी,
वीरानगी-दहशत सी छायी हो,
वतन में जब कभी,
गर्दिश कहर बन करके आयी हो,
बहारों को मनाने को,
सुखनवर गीत लाया है।
हृदय की बात कहने को,
कलम अपना चलाया है।।

21 टिप्‍पणियां:

  1. हृदय की बात कहने को,
    कलम अपना चलाया है।
    पिरोकर भाव लफ्जों में,
    ग़ज़ल और गीत लाया है।।

    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. हृदय की बात कहने को,
    कलम अपना चलाया है।
    पिरोकर भाव लफ्जों में,
    ग़ज़ल और गीत लाया है।।

    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  3. "बिछाएँ हों किसी ने जब,वफा की राह में काँटे
    ,लगीं हो दोस्ती में जब,जफाओं की कठिन गाँठे,
    दबे जज्बात कहने का,बहाना हाथ आया है।
    हृदय की बात कहने को,कलम अपना चलाया है।।"

    बहुत सुंदर भावपूर्ण कविता केसे लिख लेते है आप शास्त्री जी !
    .
    ".चमन में जब कभी,वीरानगी-दहशत सी छायी हो,
    वतन में जब कभी,गर्दिश कहर बन करके आयी हो,
    बहारो को मनाने को,सुखनवर गीत लाया है।
    हृदय की बात कहने को,
    कलम अपना चलाया है।।"

    उत्तर देंहटाएं
  4. गजल और गीत क्या है,नहीं कोई जान पाया है।
    हृदय की बात कहने को,कलम अपना चलाया है।।

    बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना... आदरणीय शास्त्री जी धन्य है आपकी कलम.....

    उत्तर देंहटाएं
  5. चमन में जब कभी,
    वीरानगी-दहशत सी छायी हो,
    वतन में जब कभी,
    गर्दिश कहर बन करके आयी हो,
    बहारों को मनाने को,
    सुखनवर गीत लाया है।

    बहुत सुन्दर भाव ...मन कि बात कहने के लिए ही कलम चलाया जाता है ...बहुत अच्छी लगी रचना

    उत्तर देंहटाएं
  6. bahut hi sahaj bhaw se asar paida karte hai aap...kahin uljhna nahi padta... :)

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुन्दर.
    गीत हो या गज़ल मन की संवेदनाये व्यक्त करने के लिए ही बनते हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  8. बेहतरीन रचना...बढ़िया परिभाषित किया.

    उत्तर देंहटाएं
  9. वाह ... बहुत ही खूबसूरत भावमय करते शब्‍द ।

    उत्तर देंहटाएं
  10. जिंदगी का रुख किस तरफ भी बदलें ...
    कलम लिख ही जाती है कुछ गीत औ ग़ज़लें !

    उत्तर देंहटाएं
  11. मिलन की जब घड़ी होती,
    बिछुड़ जाने का गम होता,
    तभी पर्वत के सीने से,
    निकलता धार बन सोता,
    उफनते भाव के नद को,
    करीने से सजाया है।
    bahut bahut pyaari lines hain.atiuttam rachna.

    उत्तर देंहटाएं
  12. वाह वाह बहुत सुन्दर भावो का संयोजन्…………आपकी कलम ऐसे ही चलती रहे।

    उत्तर देंहटाएं
  13. शास्त्रीजी---

    कलम अपना चलाया है।।

    बिछाएँ हों किसी ने जब,--- बहुत अशुद्धियां हैं---उदाहरण स्वरूप ये हैं...

    १- कलम स्त्री लिन्ग है हिन्दी में...चलाई जाती है चलाया नहीं जाता...
    २- बिछाये सही है...बिछाएँ नहीं....
    ३- मात्रा दोष भी है कहीं कहीं..
    ---केवल भावों को लफ़्ज़ों में पिरोना गज़ल या गीत नहीं होता..भाषा की शुद्धता व .कलात्मकता का पक्ष भी आवश्यक है ...

    उत्तर देंहटाएं
  14. डॉ. श्याम गुप्त जी!
    आपका कहना सही है मगर अपनी जगह!
    कलम न तो पुर्लिंग है और न ही स्त्रीलिंग
    इसे दोनों रूप में ही प्रयोग किया जा सकता है।
    दूसरी बात कलम हिन्दी का लब्ज नहीं है।
    --
    आप मुझसे अधिक विद्वान हैं।
    आपको मेरी त्रुटियाँ गिनाने का पूरा हक है।
    --
    दूसरी बात यह है कि मैं स्वान्तःसुखाय लिखता हूँ।
    आपको अच्छा लगता है तो यह मेरा सौभाग्य है और अच्छा नहीं लगता तो कोई बात नहीं।
    बहस या कुतर्क करने के लिए कमेंटबाक्स नहीं है।
    मेरे मेल पर आइए, आपका स्वागत है।
    --

    उत्तर देंहटाएं
  15. डॉ. श्याम गुप्त जी!
    आपने मात्र दोष मेरी रचनाओं में निकाला है। आपकी बात सही है।
    ब्लॉग पर बात समझ में आ जाए। बस इतना ही काफी है।
    जब पुस्तक का ाकार अपनी रचनाओं को दूँगा तो आपकी सहायता की मुझे जरूर जरूरत होगी।
    --
    कहना नहीं चाहता था मगर अपनी टिप्पणी में ही देख लीजिए।
    क्या लिंग "लिन्ग" लिखना सही है?
    --
    माफ करना यह सब त्रुटियाँ अनजाने में ही हो जाती हैं।
    --
    रही बात कलापक्ष की।
    मेरी रचनाओं में कलापक्ष वास्तव में नहीं है।
    मैं यह स्वीकार करता हूँ!

    उत्तर देंहटाएं

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