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गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

'बदनाम' शायर की एक ग़ज़ल (प्रस्तोता-डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

"ग़ज़ल"

वो शम्मा मोहब्बत की, जला कर चले गये।
एक याद मेरे दिल में, बसा कर चले गये।।

बुझती नहीं है आग, लगायी जो सनम ने,
यादों की पालकी में, बिठा कर चले गये।।

वो इश्क के वादों में, कसम प्यार की खाकर,
दामन को अपने हमसे, छुड़ा कर चले गये।।

खुशियाँ थी बेशुमार, जब वो पास थे मेरे,
वो शम्मा आरजू की, बुझा कर चले गये।।

अपनी तो जफा याद है, उनकी न वफा न याद,
घर को मेरे ‘बदनाम’, बनाकर चले गये।।
गुरू सहाय भटनागर "बदनाम"

16 टिप्‍पणियां:

  1. खुशियाँ थी बेशुमार, जब वो पास थे मेरे,
    वो शम्मा आरजू की, बुझा कर चले गये..

    Very touching lines.

    .

    उत्तर देंहटाएं
  2. "वो इश्क के वादों में, कसम प्यार की खाकर,
    दामन को अपने हमसे, छुड़ा कर चले गये।।"...
    wonderful gazal...

    उत्तर देंहटाएं
  3. वो शम्मा मोहब्बत की, चला कर चले गये।
    एक याद मेरे दिल में, बसा कर चले गये।।

    मुझे लगता है कि चला कर चले गए की जगह जला कर चले गए लिखा जाना चाहिये था.

    तीखे तड़के का जायका लें
    संसद पर एटमी परीक्षण

    उत्तर देंहटाएं
  4. Nice post.
    पोस्ट बता रही है खटीमा लोकेशन आपकी
    हम समझे थे कि आप सम्मेलन में चले गए

    उत्तर देंहटाएं
  5. खुशियाँ थी बेशुमार, जब वो पास थे मेरे,
    वो शम्मा आरजू की, बुझा कर चले गये..

    बहुत ही सशक्त शे'र लगे !
    सम्मेलन की बधाई !

    उत्तर देंहटाएं
  6. बुझती नहीं है आग, लगायी जो सनम ने,
    यादों की पालकी में, बिठा कर चले गये।।

    ..बहुत ख़ूबसूरत गज़ल..

    उत्तर देंहटाएं
  7. बदनाम जी की अति सुंदर शायरी जी धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  8. खुशियाँ थी बेशुमार, जब वो पास थे मेरे,
    वो शम्मा आरजू की, बुझा कर चले गये।।

    बहुत अच्छी ‘बदनाम’ जी की ग़ज़ल है।

    उत्तर देंहटाएं

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