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शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

"खरबूजे थे मन को भाये" (डॉ.रूपचन्नद्र शास्त्री ' मयंक')


 
हरे-बसन्ती, पीले-पीले।
खरबूजे हैं बहुत रसीले।।

जब हम पिकनिक पर जाएँगे।
तब जी भर करके खायेंगे।।

छुट्टी के दिन गये नदी पर।
लाया मैं पेटी में भर कर।।
घनी पेड़ की छाया पा कर।
बैठ गये चादर फैला कर।।
खरबूजे थे मन को भाये।
बहुत चाव से सबने खाये।।

14 टिप्‍पणियां:

  1. कहते हैं
    खरबूजे को देख कर खरबूजा रंग बदलता है
    हमने भी रंग बदल लिया है,इसीलिए लिख रहा हूँ कि

    खरबूजा खा के ,खरबूजा दिखलाया
    शास्त्री जी आपका यह 'कवित्त' बहुत पसंद आया
    काश! एक खरबूजा हमें भी खिलवा देते
    खैर,कोई बात नहीं,खरबूजा न सही
    मेरे ब्लॉग पे आ एक खरबूजानुमा टिपण्णी ही दे देते.
    राम-जन्म पर आपको बुलावा है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. मुशायरे में देखा जो
    खाने हम भी आए

    mushayera.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  3. आदरणीय शास्त्री जी
    सादर सस्नेहाभिवादन !

    शास्त्रीजी के ठाठ हैं … कभी तरबूज … कभी खरबूजे … :)
    प्यारी रचना के लिए साधुवाद !

    * श्रीरामनवमी की शुभकामनाएं ! *

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

    उत्तर देंहटाएं
  4. मैंने भी कल एक ठेले वाले को खरबूजे बेचते देखा. बहुत मन किया कि खरीदकर अभी खा लूं, लेकिन ऐसा कर नहीं पाया. आपने आज फिर याद दिला दिया. अब तो एक दो दिनों में खाना ही पड़ेगा.

    मेरा ब्लॉग भी देखें
    भले को भला कहना भी पाप

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह ... इस बार खरबूजे ... बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (16.04.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाह ... इस बार खरबूजे, बहुत खूब .

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह ... इस बार तो खरबूजे देखने को मिला है लेकिन खाने को कब मिलेगा ....

    उत्तर देंहटाएं
  9. इस बार तो रचना से अधिक आपकी तारीफ करनी पड़ेगी.. बहुत स्मार्ट लग रहे हैं...

    उत्तर देंहटाएं
  10. खरबूजे देखकर गर्मी की आहट आने लगी।

    उत्तर देंहटाएं
  11. खरबूजे देखकर गर्मी की आहट आने लगी।

    उत्तर देंहटाएं

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