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मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

"ककड़ी मोह रही सबका मन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

लम्बी-लम्बी हरी मुलायम।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।
कुछ होती हल्के रंगों की,
कुछ होती हैं बहुरंगी सी,
कुछ होती हैं सीधी सच्ची,
कुछ तिरछी हैं बेढंगी सी,
ककड़ी खाने से हो जाता,
शीतल-शीतल मन का उपवन।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।
नदी किनारे पालेजों में,
ककड़ी लदी हुईं बेलों पर,
ककड़ी बिकतीं हैं मेलों में,
हाट-गाँव में, फड़-ठेलों पर,
यह रोगों को दूर भगाती,
यह मौसम का फल है अनुपम।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।
आता है जब मई महीना,
गर्म-गर्म जब लू चलती हैं,
तापमान दिन का बढ़ जाता,
गर्मी से धरती जलती है,
ऐसे मौसम में सबका ही,
ककड़ी खाने को करता मन।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।

16 टिप्‍पणियां:

  1. वाह्……………आज तो ककडी की महिमा का गुणगान हो गया …………पढने के बाद खाने को मन करने लगा।

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  2. मौसम के अनुकूल कविता... बहुत सुन्दर ..

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  3. वाह ! आखिर मिल ही गया आज का सब्जेक्ट ! वो भी इतनी प्यारी ककड़ी ! किस को नही भाएगी

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  4. han aur ek bat, pata chala hai ki injection ka bhi istemal kiya jaa raha hai : SAWDHAN>>>>>>>>>>>>

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  5. बहुत सुन्दर ....मौसम के अनुकूल रचना

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  6. कविता के साथ तस्वीरें इतनी अच्छी हैं कि खाने का मन हो आया...

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  7. ककड़ी री ककड़ी
    तू क्यूँ अकड़ी
    अब गर्मी आई है तो
    जायेगी तू पकड़ी
    तेरे बढते दामों को देख
    दिल की धडकन सबकी धडकी
    माना तू है सबकी प्यारी
    करले फिर सबसे यारी
    कुछ सस्ती हो जा ओ रानी
    फिर सभी भरेंगें तेरा ही पानी.

    वाह! शास्त्रीजी वाह! आपसे कविता नहीं तो
    तुकबंदी तो जरूर सीख जायेंगे.

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  8. अरे गुरु जी, अभी कुछ ही दिन पहले जब मैं मुरादाबाद से दिल्ली आ रहा था तो गढ़ पे जाम लगा हुआ था, मैंने भी जाम में खड़े खड़े ककड़ियां खरीदी और मज़े से काले नमक के साथ खाई....बहुत मज़ा आया!

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  9. बहुत सुन्दर मौसमी कविता ..ककड़ी का भी अपना अलग मज़ा है ...और आपने तो उस पर रचना ही लिख दी ...बहुत सुन्दर

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  10. kakdi bhi dhany ho gayi , aapke dwara shabdon mein dhalne ke baad.

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  11. वाह ... आज तो ककड़ी है आपकी रचनाओं की कड़ी में ..बहुत खूब .. ।

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  12. जीवन से जुड़े विषयों पर प्यारी प्यारी कवितायें।

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