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शनिवार, 16 अप्रैल 2011

"यह चबेना अपनाओ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ' मयंक')


कहीं कहे जाते हैं परमल, और कहीं पर लाई।
कहीं-कहीं पर इन्हें, मुरमुरे भी कहते हैं भाई।।
यह हैं चने, सभी इनको खाने को बहुत मचलते हैं।
सही सलामत दाँत अगर हों, सोंधे-सोंधे लगते हैं।। 
एक साथ ही मिला लीजिए, चने और परमल को।
प्रातराश में इन्हें खाइए, और पीजिए जल को।।

बचपन में गुरुकुल में, मैं इनको प्रतिदिन खाता था।
फिर ठण्डा पानी पीकर, शाला में पढ़ने जाता था।।

सच मानों उन दिनों, न कोई मुझको रोग सताता था।
शाकाहारी और पौष्टिक भोजन खा, हर्षाता था।।

इस रूखे-सूखे व्यञ्जन की, याद मुझे जब आती है।
चने और परमल खाने की उत्कण्ठा बढ़ जाती है।।

रोज नहीं बस हफ्ते में दो-चार बार मैं खाता हूँ।
सबसे बढ़िया व्जञ्जन का आनन्द इन्हीं में पाता हूँ।।

हृष्ट-पुष्ट यदि रहना चाहो, यह चबेना अपनाओ।
नित्य-नियम से चबा-चबा कर, प्रातराश में तुम खाओ।।

14 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे लगता है कि कोई भी विषय आपसे अछूता नहीं रहेगा ..बहुत अच्छी सीख देती सुन्दर रचना

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  2. स्वास्थयवर्धक स्वादिष्ट कविता. :)

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  3. वाह क्या खूब अन्दाज़ है प्रस्तुत करने का कि यदि कोई ना भी खाता होगा तो आज जरूर खायेगा…………बहुत सुन्दर्।

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  4. नये नये विषयों पर सुन्दर रचनायें।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत खाया है परमल और चना ! मुझे पसंद भी है--
    आज की पोस्ट के लिए धन्यवाद शास्त्री जी !

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  6. आजकल आपकी पोस्ट देखकर मुंह में पानी का दरिया आ जाता है..

    उत्तर देंहटाएं
  7. मयंक जी,
    पुराने दिन याद दिला दिए। बंगाल मे इसे 'मुड़ी' कहा जाता है। मसालेदार बना कर जगह-जगह बिकती है, 'झाल मुड़ी' के नाम से। सस्ता, सुंदर, टिकाउ नाश्ता है हर जगह का।

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  8. बहुत अच्छी सीख....…बहुत सुन्दर्।

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  9. अब तो यह स्वादिष्ट स्वास्थ्यवर्धक चबेना अपनाना ही पड़ेगा

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  10. मैने तो आज खाया भी.
    वाकई मजेदार है.

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत सुंदर बात कही, पर्मल तो हम भी यहां कभी कभी खाते हे चने भी बहुत स्वाद लगते हे,

    उत्तर देंहटाएं

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