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शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

"चार दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


पनप रहा है आजकल, जन-गण में व्यभिचार।
नीचे से ऊपर तलक, फैला भ्रष्टाचार।।
--
प्रजातन्त्र से है दुखी, जनता सारी आज।
रिश्वत बिना न आजकल, बनता कोई काज।।
--
मत की ताकत से बना, निर्धन भी धनवान।
सत्ता सुख में लिप्त हो, बन बैठा शैतान।।
--
जनता के सौजन्य से, सिंहासन को पाय।
पाँच साल तक शान से, आँखे रहा दिखाय।।

14 टिप्‍पणियां:

  1. वाह!

    एक से बढ़कर चार...

    हर एक दोहा सच्चाई दिखाता हुआ..

    कुँवर जी,

    उत्तर देंहटाएं
  2. पाँच साल तक शान से, आँखे रहा दिखाय.

    सोलहों आने सच...

    उत्तर देंहटाएं
  3. शास्त्री जी पांच साल पुरे तो होने ही चाहियें.नहीं तो पहले ही लुढके, तो फिर अरबों खरबों का चुनाव.सहन करनी पड़ेंगी आँखें.

    आप मेरे ब्लॉग पर आईये.रामराज्य पर दूसरी पोस्ट जारी कर दी है.

    उत्तर देंहटाएं
  4. सटीक और प्रासंगिक प्रस्तुति ...चारों दोहे बेमिसाल

    उत्तर देंहटाएं
  5. क्या खूब दिखया आपने समाज का आइना ...इन दोहों से ... सादर

    उत्तर देंहटाएं
  6. व्यवस्था की पोल खोलते रोचक और विचारोत्तेजक दोहे।

    उत्तर देंहटाएं
  7. व्यंग्य के साथ ही जनसामान्य की विवशता और गहरी पीड़ा भी आपके दोहों में समाहित है।

    उत्तर देंहटाएं
  8. सच्चाई से रु-ब-रु कराते और व्यवस्था पर करारा वार करते दोहे बेहद शानदार हैं।

    उत्तर देंहटाएं

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