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गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

"ठण्डे रस का भरा माल था" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


जब गरमी की ऋतु आती है!
लू तन-मन को झुलसाती है!!

तब आता तरबूज सुहाना!
ठण्डक देता इसको खाना!!
watermelons-5556
यह बाजारों में बिकते हैं!
फुटबॉलों जैसे दिखते हैं!!

एक रोज मन में यह ठाना!
देखें इनका ठौर-ठिकाना!!
पहुँचे जब हम नदी किनारे!
बेलों पर थे अजब नजारे!!

कुछ छोटे कुछ बहुत बड़े थे!
जहाँ-तहाँ तरबूज पड़े थे!!
Watermelon field prachi
इनमें से था एक उठाया!
बैठ खेत में इसको खाया!! 
Watermelon
इसका गूदा लाल-लाल था! 
ठण्डे रस का भरा माल था!! 

24 टिप्‍पणियां:

  1. एक दम से मन कर रहा है कि इसे खा लूं।
    बहुत सरस कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपने तो ललचा दिया तरबूजे को दिखाकर, किन्तु आपकी कविता की रसों ने भरपूर स्वाद दिया, आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुबह तरबूज खरीदने ही बाजार गए लेकिन कई जगह रास्‍ते बन्‍द थे तो बिना खरीदे ही वापस आना पड़ा। अब आप इतने चटक लाल तरबूज दिखा रहे हैं और मन को ललचा रहे हैं!

    उत्तर देंहटाएं
  4. मूँह में पानी आ गया शास्त्री जी...

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी कविता की मिठास ने तरबूज को और मीठा बना दिया.बहुत प्यारी बाल कविता.
    अब तो खाना ही पड़ेगा.

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  6. बहुत सुन्दर बालगीत..फोटो देख कर मन ललचा गया..आभार

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  7. मेरे पापा कहते थे कि खेत से तोड़ कर वहीँ उसे फोड कर तरबूज खाने का अपना ही मजा है...आज आपकी कविता ने वो मजा दिला दिया.
    आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  8. तरबूजे इतने अच्छे पहले कभी नहीं लगे । अब तो तरबूजे खरीदने जाना ही पडेगा ....

    उत्तर देंहटाएं
  9. वाह शास्त्री जी आप ने हमें गाँव के खेतों में पाहुचा दिया

    बहुत ही सुंदर बाल कविता

    उत्तर देंहटाएं
  10. इस बार का मौसम अभी तक तरबूज की लाली देखने को तरसा रहा है !

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  11. वाह वाह …………मुंह में पानी आ गया..

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  12. to garmi ka pancham lahra diya aapne.bahut khoob.bahut saral bachchon ki tarah hi pyari si rachna.

    उत्तर देंहटाएं
  13. वाह ...बहुत ही खूबसूरत शब्‍दों के साथ बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  14. बहुत सुन्दर कविता ..तरबूज तो रसभर आया .. पर आपकी तस्वीर भी अच्छी लगी... और कटा हुवा तरबूज तो बेहद सुन्दर फोटोग्राफी

    उत्तर देंहटाएं

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