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बुधवार, 13 अप्रैल 2011

"खबर छपी अखबारों मे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


साहित्यिक गतिविधियाँ सारी,
हुई लुप्त अंधियारों में।

हत्या और बलात्-कर्म की,
खबर छपी अखबारों में।।

तानाशाही और मनमानी,
चौथा खम्भा करता है,
छँटे हुए इन पढ़े लिखों से,
तन्त्र प्रजा का डरता है,
तूती की आवाज़ दब गई,
कर्कश ढोल-नगाड़ों में।
हत्या और बलात्-कर्म की,
खबर छपी अखबारों में।।

कोकिल के मीठे सुर केवल,
डाली तक ही सीमित है,
गंगा जी की पावन धारा,
मैली सी है-दूषित है,
काग सुनाते बेढंगे स्वर,
आँगन और चौबारों में।
हत्या और बलात्-कर्म की,
खबर छपी अखबारों में।।

18 टिप्‍पणियां:

  1. कोकिल के मीठे सुर केवल,
    डाली तक ही सीमित है,
    गंगा जी की पावन धारा,
    मैली सी है-दूषित है,
    काग सुनाते बेढंगे स्वर,

    bahut sateek abhvyakti .

    उत्तर देंहटाएं
  2. काग सुनाते बेढंगे स्वर,
    आँगन और चौबारों में।
    हत्या और बलात्-कर्म की
    खबर छपी अखबारों में।।
    बहुत खूब ! एकदम सही बात कही शास्त्री जी आपने रचना के माध्यम से !

    उत्तर देंहटाएं
  3. यही है। आपने एक अच्छे मुद्दे को पंक्तियों में बांधा है। बेहतरीन। इससे जुड़ा कुछ मैंने भी लिखा है।
    मेरे ब्लॉग पर आयें, स्वागत है
    दुनाली

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (14-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  5. यही छापकर अखबारों ने अपना स्तर गिरा लिया है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. सही है. आज अखबार केवल आपराधिक खबरों तक ही सिमट गये हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  7. 'कोकिल के मीठे सुर केवल,डाली तक ही सीमित है'
    काश! कोकिल के मीठे स्वर ही सर्वत्र गूंजें.
    अखबार और मिडिया को नकारात्मक खबरों को कम करके सकरात्मक पक्ष को ज्यादा उजागर करना चाहिये तभी कोकिल के स्वर सर्वत्र गूंजेंगे.

    उत्तर देंहटाएं
  8. काव्य के माध्यम से सच बयां कर दिया आपने दुनिया का...बहुत सुंदर।

    उत्तर देंहटाएं
  9. वर्तमान को आइना दिखाता हुआ सामयिक और सुन्दर गीत लिखा है आपने.बहुत बढ़िया.

    उत्तर देंहटाएं
  10. आदरणीय शास्त्री जी वर्तमान हालात पर बहुत ही करारा व्यंग्य किया है आपने| खास कर लोकतन्त्र के चौथे और सब से मजबूत समझे जाने वाले स्तम्भ को भी नहीं बख्शा है आपने|

    उत्तर देंहटाएं
  11. तानाशाही और मनमानी,
    चौथा खम्भा करता है,
    छँटे हुए इन पढ़े लिखों से,
    तन्त्र प्रजा का डरता है,

    आपने सभी की दुखती रग पर हाथ रखा है शास्त्री जी ! आपकी तीक्ष्ण दृष्टि को नमन !

    उत्तर देंहटाएं
  12. काग सुनाते बेढंगे स्वर,
    आँगन और चौबारों में।
    हत्या और बलात्-कर्म की
    खबर छपी अखबारों में।।
    आजकल अखबार पढने का मन ही नही होता बस ऐसे ही समाचारों का संकलन रह गयी हैं अखबारें। आभार सुन्दर रचना के लिये।

    उत्तर देंहटाएं
  13. तूती की आवाज़ दब गई,
    कर्कश ढोल-नगाड़ों में।
    हत्या और बलात्-कर्म की,
    खबर छपी अखबारों में।।
    बहुत सटीक कलम चली है....यही कुछ हो रहा है और ढोल-नगाड़ों में तूती की आवाज दबकर रह गई है....

    उत्तर देंहटाएं

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