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सोमवार, 1 अक्तूबर 2012

"पहना दो गद्दारों को जूतों की माला" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


मक्कारों ने अपने गुलशन को वीरान बना डाला।
पहना दो अब गद्दारों को चप्पल-जूतों की माला।।

जागा सबका मन, और माटी का जागा है कण-कण,
जागी कलियाँ और चमन का जागा है हर एक सुमन,
आस्तीन में पलने नही देंगे, कोई विषधर काला।
पहना दो अब गद्दारों को चप्पल-जूतों की माला।।

धन-बल से इन्सानों के, ईमान नही बिक पायेंगे,
असली के आगे, नकली भगवान नही टिक पायेंगे,
देश-भक्त इन शैतानों को याद दिला देंगे खाला।
पहना दो अब गद्दारों को चप्पल-जूतों की माला।।

जमा विदेशों में सारा, अब काला-धन लाना होगा,
जन-गण-मन में, स्वाभिमान का अलख जगाना होगा,
उग्रवादियों की गरदन में, डालो फाँसी की माला।
पहना दो अब गद्दारों को चप्पल-जूतों की माला।।

10 टिप्‍पणियां:

  1. इस आक्रोश को भी नमन ||
    आभार गुरूजी ||

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेहतरीन सृजन ...बहुत -२ बधाईयाँ जी ...l

    उत्तर देंहटाएं
  3. दिल के खुश रखने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है...पर घंटी बांधेगा कौन...

    उत्तर देंहटाएं
  4. उग्रवादियों की गरदन में, डालो फाँसी की माला।
    पहना दो अब गद्दारों को चप्पल-जूतों की माला।।

    बहुत अच्छी प्रस्तुति,,,,

    RECECNT POST: हम देख न सके,,,

    उत्तर देंहटाएं
  5. Nice post.
    See
    http://mushayera.blogspot.in/2012/10/anjum-rahbermp4.html

    उत्तर देंहटाएं
  6. "आस्तीन में पलने नही देंगे, कोई विषधर काला"
    जय हिंद

    उत्तर देंहटाएं
  7. सहमत, बात तो फिर ऐसे ही होनी चाहिए


    जब भी समय मिले, मेरे नए ब्लाग पर जरूर आएं..
    http://tvstationlive.blogspot.in/2012/09/blog-post.html?spref=fb

    उत्तर देंहटाएं
  8. शास्त्री सर ,
    काश आपका ये रचना, ये सपना सच हो जाए... तो इस देश में खुशहाली की हरियाली छा जाए...
    ~सादर !

    उत्तर देंहटाएं

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