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गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012

"लिखो रक्त की स्याही से..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


त्रस्त हुआ है लोकतन्त्र अब.
बढ़ती तानाशाही से।
खून सनी है क़ल़म सुख़नवर,
लिखो रक्त की स्याही से।।

गद्दारी के मानदण्ड सब,
मक्कारों ने तोड़ दिये।
भोली-भाली जनता के,
सख़्ती से कान मरोड़ दिये।
गन्ध दासता की आती है,
सरकारी मनचाही से।
खून सनी है क़ल़म सुख़नवर,
लिखो रक्त की स्याही से।।

भामाशाह वतन में कितने,
नेक-नीति व्यापारी हैं।
बुला रहे फिर क्यों विदेश से,
ऐसी क्या लाचारी है?
डर लगता है फिरंगियों की,
बढ़ती आवाजाही से।
खून सनी है क़ल़म सुख़नवर,
लिखो रक्त की स्याही से।।

मौन हुए सब देख रहे हैं,
चढ़ते हुए समन्दर को।
कौन कलन्दर नचा रहा है,
अंगुलियों पर बन्दर को।
किसने भरी तिजोरी अपनी,
भ्रष्टाचरण उगाही से।
खून सनी है क़ल़म सुख़नवर,
लिखो रक्त की स्याही से।।

ऊधमसिंह-आज़ाद, भगतसिंह,
फिर से रण में उतरेंगे।
जन-जन के बाँकुरे सिपाही,
दुष्टों के पर कतरेंगे।
वही बचायेंगे भारत को,
उमड़ी हुई तबाही से।
खून सनी है क़ल़म सुख़नवर,
लिखो रक्त की स्याही से।।

21 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर चित्रांकन,बहुत सराहनीय प्रस्तुति.
    बहुत सुंदर बात कही है इन पंक्तियों में. दिल को छू गयी. आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  2. जोश भर देने वाली उम्दा रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  3. आज का ज़माना इन्ही शब्दों को लिखने की प्रेरणा देता है ..
    सशक्त ..

    उत्तर देंहटाएं
  4. उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत ही ओजपूर्ण और प्रेरक प्रस्तुति.
    समय मिलने पर मेरे ब्लॉग पर भी आईएगा,शास्त्री जी.

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत बढ़िया...जानदार प्रस्तुति....
    ये सबसे सुन्दर..
    मौन हुए सब देख रहे हैं,
    चढ़ते हुए समन्दर को।
    कौन कलन्दर नचा रहा है,
    अंगुलियों पर बन्दर को।
    किसने भरी तिजोरी अपनी,
    भ्रष्टाचरण उगाही से।
    खून सनी है क़ल़म सुख़नवर,
    लिखो रक्त की स्याही से।।...

    वाह..
    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  7. सही वक़्त है,इसी तरह के 'क्रान्ति-पन्थ'दिकालाने का !
    नहीं वक़्त है,फिसलन वाले,मन्त्र वर्थ सिखलाने का ||
    सच है,अगर लेखनी होगी,'सच की स्याही'में डूबी-
    तब आएगा,समय बाग़ में महके फूल खिलाने का ||

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह! बहुत सार्थक अभिव्यक्ति..

    उत्तर देंहटाएं
  9. क्यों लगाया है उम्मीदे मुसाफिर उनसे
    जो खुद नाउम्मीदगी का दामन थाम बैठे है
    निकला है उन्हें तु जगाने
    जो सोने का बहाना कर लेटे है

    उत्तर देंहटाएं
  10. आज ऐसे हुंकारी की जरूरत है, वर्ना आने वाले समय में हम और बदतर स्थिति में होंगे हमें सही व्यक्ति को चुनना होगा

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति प्रेरक रचना,,,,,,

    MY RECENT POST: माँ,,,

    उत्तर देंहटाएं
  12. अच्छा चित्रण किया है अभी की परिस्थितियों का | ओजपूर्ण और प्रभावी रचना |

    उत्तर देंहटाएं
  13. इस ओज पूर्ण गीत में खुला आवाहन है भारत की जनता का जागो ,गद्दार देश बेच रहें हैं .

    एक शैर इस गीत और गीतकार के नाम -

    तेरी सौदागरी ने देश का भूगोल तक बेचा ,

    खुदा के वास्ते बसकर ,बचा इतिहास रहने दे .

    बधाई शास्त्री जी इस जोश बढाने वाले गीत के लिए .

    उत्तर देंहटाएं
  14. SORT

    Virendra Sharma
    बृहस्पतिवार, 11 अक्तूबर 2012

    "लिखो रक्त की स्याही से..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

    त्रस्त हुआ है लोकतन्त्र अब.
    बढ़ती तानाशाही से।
    खून सनी है क़ल़म सुख़नवर,
    लिखो रक्त की स्याही से।।

    गद्दारी के मानदण्ड सब,
    मक्कारों ने तोड़ किये।
    भोली-भाली जनता के,
    सख़्ती से कान मरोड़ दिये।
    गन्ध दासता की आती है,
    सरकारी मनचाही से।
    खून सनी है क़ल़म सुख़नवर,
    लिखो रक्त की स्याही से।।

    भामाशाह वतन में कितने,
    नेक-नीति व्यापारी हैं।
    बुला रहे फिर क्यों विदेश से,
    ऐसी क्या लाचारी है?
    डर लगता है फिरंगियों की,
    बढ़ती आवाजाही से।
    खून सनी है क़ल़म सुख़नवर,
    लिखो रक्त की स्याही से।।

    मौन हुए सब देख रहे हैं,
    चढ़ते हुए समन्दर को।
    कौन कलन्दर नचा रहा है,
    अंगुलियों पर बन्दर को।
    किसने भरी तिजोरी अपनी,
    भ्रष्टाचरण उगाही से।
    खून सनी है क़ल़म सुख़नवर,
    लिखो रक्त की स्याही से।।

    ऊधमसिंह-आज़ाद, भगतसिंह,
    फिर से रण में उतरेंगे।
    जन-जन के बाँकुरे सिपाही,
    दुष्टों के पर कतरेंगे।
    वही बचायेंगे भारत को,
    उमड़ी हुई तबाही से।
    खून सनी है क़ल़म सुख़नवर,
    लिखो रक्त की स्याही से।।
    इस ओज पूर्ण गीत में खुला आवाहन है भारत की जनता का जागो ,गद्दार देश बेच रहें हैं .

    एक शैर इस गीत और गीतकार के नाम -

    तेरी सौदागरी ने देश का भूगोल तक बेचा ,

    खुदा के वास्ते बसकर ,बचा इतिहास रहने दे .

    बधाई शास्त्री जी इस जोश बढाने वाले गीत के लिए .

    veerubhai1947.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  15. बहुत जबरदस्त!!

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति....

    उत्तर देंहटाएं
  16. गद्दारी के मानदण्ड सब,
    मक्कारों ने तोड़ किये।
    भोली-भाली जनता के,
    सख़्ती से कान मरोड़ दिये।
    गन्ध दासता की आती है,
    सरकारी मनचाही से।
    खून सनी है क़ल़म सुख़नवर,
    लिखो रक्त की स्याही से।।

    एक हुंकार भरती ओजपूर्ण रचना मन को भा गयीं

    उत्तर देंहटाएं
  17. देश के वर्तमान परिदृश्य को बदल् देने का अहवाह्न करती जोशीली कविता -बहुत बढ़िया

    उत्तर देंहटाएं

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