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सोमवार, 8 अक्तूबर 2012

"आशा शैली की एक कविता" ज़र्द पत्ते (प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

ज़र्द पत्ते हो गए हम 
झूलते हैं 
शाख़ से 
ज़र्द पत्तों की भला 
कीमत कहाँ 
बस किताबों के लिए 
अपना वुजूद
किस लिए 
यूँ कांपते उड़ते फिरें

थरथराते-डोलते से 
यूँ हवा के देश पर
क्यों निगाहे ज़ीस्त में 
घिरते फिरें
एक दिन सूखेंगे और 
पतझड़ बनेंगे
पाँव के नीचे कुचल 
पिसते रहेंगे
चरमराते तोड़ते ख़ामोशियाँ 

पर शिकायत है 
शजर से
कल तलक हम से ही था 
उसका वुजूद 
आज उसकी शाख़-शाख़  
हमको हवा देने लगी

कब गिरें हम टूटकर 
हरएक पत्थर कह रहा
और हम लाचार पत्ते 
बस हवाओं से डरें
देखिए अब ये हवाएँ क्या करें

पर नहीं मिट के भी मिट पाएँगे हम 
ये हवा हम को 
कहीं ले जाएगी
एक झरना 
बह रहा जो प्रीत का
हम उसी की ओर 
क्यों न रुख़ करें
मिल के पानी में 
उगें फिर फूल बन जाएँ कहीं
और खुशबू बन के फैलें
इस जहाँ में
आओ साथी 
हम हवा के संग 
तलाशें हम सुख़न 
कुछ मचलते से आबशार
श्रीमती आशा शैली

12 टिप्‍पणियां:

  1. वाह गुरु जी वाह-
    उत्कृष्ट प्रस्तुति |
    आभार ||
    रचनाकार को बधाई ||

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर रचना....
    आभार शास्त्री जी.

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बढ़िया प्रस्तुति,,,,,रचनाकार को बधाई,,,

    उत्तर देंहटाएं
  4. आशा जी को इस सुन्दर रचना हेतु बहुत बहुत बधाई और साझा करने के लिए शास्त्री जी को भी बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  5. sahi maayane mein ek aisi shbd rachna hai yah jo bhawo se paripurn hai
    ek sangraneey rachna.. padh liya aur kafi kuch seekh bhi liya..

    उत्तर देंहटाएं
  6. आशा जी को बधाई .....एक सोच ..नाकारात्म से सकारात्म की ओर

    उत्तर देंहटाएं
  7. आपकी इस उत्कृष्ट प्रस्तुति की चर्चा कल मंगलवार ९/१०/१२ को चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा चर्चामंच पर की जायेगी

    उत्तर देंहटाएं
  8. इस सार्थक प्रस्तुति के लिए आभार शास्त्री जी ,साथ ही आशा जी को भी इस सकारात्मक रचना के लिए बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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