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बुधवार, 10 अक्तूबर 2012

"राज़ समझ नहीं आया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कैसे मन हो गया विदेशी?
राज़ समझ नहीं आया है।
काले अंग्रेजों ने अपनी,
माँ का दूध लजाया है।।

अपने घर में अन्न बहुत है,
फिर क्यों हाथ पसार रहे?
अपनी सोनचिड़य्या के,
क्यों सारे वस्त्र उतार रहे?
मनमोहक संगीत छोड़कर,
राग विदेशी गाया है।
काले अंग्रेजों ने अपनी,
माँ का दूध लजाया है।।

कितनी सदियों तक हमने थे,
दंश गुलामी का झेले?
फिर स्वतन्त्रता को पाने को,
कितने पापड़ थे बेले?
बलिदानों से हमने अपनी,
आजादी को पाया है।
काले अंग्रेजों ने अपनी,
माँ का दूध लजाया है।।

हंस और बगुलों की,
आपस में कैसी नातेदारी!
कल ये मानसरोवर पर,
कर देंगे निज दावेदारी।
उस थाली में छेद करो मत,
जिसमें तुमने खाया है।।
काले अंग्रेजों ने अपनी,
माँ का दूध लजाया है।।

मुद्दत से केशरक्यारी की,
विकट समस्या लटकी है।
पाक-चीन के कब्ज़े में,
अपनी धरती क्यों अटकी है?
याद करो भारत का किसने,
बँटवारा करवाया है!
काले अंग्रेजों ने अपनी,
माँ का दूध लजाया है।।


19 टिप्‍पणियां:

  1. आपने ऊपर जो चित्र लगाए है उसमे एक और जोड़ना चाहूँगा - इटली के कब्जे में बाकी भारत देश ! बढ़िया रचना शास्त्री जी !

    उत्तर देंहटाएं
  2. राज समझने के लिये राजनीति समझनी होगी

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही सार्थक अभिव्‍यक्ति ... आभार इस उत्‍कृष्‍ट रचना के लिए

    उत्तर देंहटाएं
  4. काले अंग्रेजों ने अपनी,
    माँ का दूध लजाया है।।

    वाह शास्त्री जी क्या खूब नाम दिया है आपने " काले अंग्रेजो………सच कहाँ कम हैं उनसे । वैसे ही तो कर्म हैं बस रंग से ही फ़र्क है

    उत्तर देंहटाएं
  5. सच कहा आपने..
    इसे तो अपने यहां होना ही चाहिए।
    देखिए कब अपना मानचित्र बदलता है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बढ़िया प्रस्तुति |
    बधाई स्वीकारें ||

    उत्तर देंहटाएं
  7. सार्थक अभिव्‍यक्ति ...बढ़िया प्रस्तुति |

    उत्तर देंहटाएं

  8. कितनी सदियों तक हमने थे,
    दंश गुलामी का झेले?......दंश गुलामी के थे झेले।।।
    फिर स्वतन्त्रता को पाने को,....(स्वतंत्रता फिर से पाने को ....
    कितने पापड़ थे बेले?
    बलिदानों से हमने अपनी,
    आजादी को पाया है।
    काले अंग्रेजों ने अपनी,
    माँ का दूध लजाया है।।

    तंज लिए प्रासंगिक रचना

    उत्तर देंहटाएं
  9. काले अंग्रेजों ने मा का दूध लजाया है |बहुत सुन्दर भाव

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत सुन्दर !
    हम रहे ना रहे पर कुछ ऐसा कर जायेंगे,
    लोग भूलना भी चाहे,तो भी भुला ना पाएंगे !

    उत्तर देंहटाएं
  11. आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी अवश्य..

    उत्तर देंहटाएं
  12. सब पकी पकाई खा रहे हैं .... सुंदर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  13. इस दौर की तल्ख़ हकीकत से रू-ब-रू कराती. बहुत ही प्रेरणादायक कविता. आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  14. एक ही विकल्प दिख रहा है.....
    करो या मरो

    उत्तर देंहटाएं
  15. बहुत दूरदर्शिता कि बात कही है कविता के माध्यम से यह हमारे देश की सुरक्षा और गौरव की बात है सचमुच चिंतनीय है इस सार्थक गीत के लिए हार्दिक बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  16. सही मुद्दे पर बहुत ही सार्थक रचना |
    नई पोस्ट:-
    ओ कलम !!

    उत्तर देंहटाएं
  17. हाय हाय ये काले अंग्रेज.
    धिक्कार है,धिक्कार है.

    आपकी प्रस्तुति आँखें खोलनेवाली है.
    आभार,शास्त्री जी.

    उत्तर देंहटाएं

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