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बुधवार, 3 अक्तूबर 2012

"गद्यगीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सुरमयी शाम,
शीतल प्रात,
छोटे दिन,
लम्बी रात,
बरसात का पलायन,
पितरों को भोजन,
पुरखों की खोज,
कौओं की मौज,
खेतों में,
धान की सुगन्ध,
मूँगफली के
होलों की गन्ध,
नर-नारियों का हुजूम,
रामलीला की धूम,
परम्पराओं का
निर्वहन,
सज रहे हैं
सिंहासन,
मुन्नों को दुलार,
मुन्नियों को दुत्कार,
कुदरत के  
निराले रंग,
यही तो हैं,
हमारे जीवन के ढंग।

12 टिप्‍पणियां:

  1. यही तो हैं,
    हमारे जीवन के ढंग।

    बखूबी वर्णन किया शास्त्री जी हमारे निराले ढंग का ...!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत बढ़िया....
    कुदरत के निराले रंग और हमारे बेढंगे ढंग...

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  3. है सटीक यह व्याख्या, फैले जीवन रंग |
    रंग- ढंग कुछ नए किन्तु, करते रविकर दंग |

    उत्तर देंहटाएं
  4. जीवन की रंग-बिरंगी व्याख्या करते निराले ढंग

    उत्तर देंहटाएं
  5. वस्तुतः 'श्राद्ध और तर्पण'=श्रद्धा +तृप्ति। आशय यह है कि जीवित माता-पिता,सास-श्वसुर एवं गुरु की इस प्रकार श्रद्धा-पूर्वक सेवा की जाये जिससे उनका दिल तृप्त हो जाये। लेकिन पोंगा-पंथियों ने उसका अनर्थ कर दिया और आज उस स्टंट को निबाहते हुये लोग वही कर रहे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  6. कविता का रस
    मन में गया बस
    सधे हुए छंद आया आनंद

    उत्तर देंहटाएं
  7. कुदरत के निराले रंग , यही हमारे जीने के ढंग !

    उत्तर देंहटाएं
  8. कौऎ तो बस पूरी
    सब्जी ही खा पाते हैं
    काजू किश्मिश भी
    बहुत लोग दिखाते हैं
    बुजुर्ग जिनके घरों के
    जिंदगी भर जिन्हें
    नहीं देख पाते हैं !

    उत्तर देंहटाएं
  9. बढ़िया गद्य गीत लेकिन शास्त्री जी कौवे तो अब सिर्फ राजनीति में ही शेष रह गएँ हैं .पारि- तंत्र तो हमने मेट दिए .

    उत्तर देंहटाएं
  10. बढ़िया गद्य गीत लेकिन शास्त्री जी कौवे तो अब सिर्फ राजनीति में ही शेष रह गएँ हैं .पारि- तंत्र तो हमने मेट दिए .

    उत्तर देंहटाएं
  11. बढ़िया गद्य गीत...कुदरत के निराले रंग और हमारे बेढंगे ढंग...

    उत्तर देंहटाएं

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