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मंगलवार, 16 अक्तूबर 2012

"वफादार है बड़े काम का" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


यह कुत्ता है बड़ा शिकारी।
बिल्ली का दुश्मन है भारी।।

बन्दर अगर इसे दिख जाता।
भौंक-भौंक कर उसे भगाता।।

उछल-उछल कर दौड़ लगाता।
बॉल पकड़ कर जल्दी लाता।।

यह सीधा-सच्चा लगता है।
बच्चों को अच्छा लगता है।।

धवल दूध सा तन है सारा।
इसका नाम फिरंगी प्यारा।।

आँखें इसकी चमकीली हैं।
भूरी सी हैं और नीली हैं।।

जग जाता है यह आहट से।
साथ-साथ चल पड़ता झट से।।

प्यारा सा पिल्ला ले आना।
सुवह शाम इसको टहलाना।।

नौकर है यह बिना दाम का।
वफादार है बड़े काम का।।

20 टिप्‍पणियां:

  1. चर्चा मंच सजा रहा, मैं तो पहली बार |
    पोस्ट आपकी ले कर के, "दीप" करे आभार ||
    आपकी उम्दा पोस्ट बुधवार (17-10-12) को चर्चा मंच पर | सादर आमंत्रण |
    सूचनार्थ |

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर बाल रचना,,,,

    नवरात्रि की शुभकामनाएं,,,,
    RECENT POST ...: यादों की ओढ़नी

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रतियोगी काटें गला, करें जीत से प्रीत |
    चूहे से बिल्ली विकट, कुक्कुर उस से जीत |
    कुक्कुर उस से जीत, मीत है युगों पुराना |
    नस्ल विदेशी ठीक, किन्तु मुँह नहीं लगाना |
    प्राण वायु का शत्रु, किन्तु हरदम उपयोगी |
    खेल कूद में फर्स्ट, बड़ा बढ़िया प्रतियोगी ||

    उत्तर देंहटाएं
  4. उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर बाल गीत...
    :-)

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  6. आजकल घर-दफ्तर, गली-मोहल्ले, सत्ता-विपक्ष हर जगह ऐसे ही वफादार पल रहे हैं...हा...हा...हा...

    उत्तर देंहटाएं
  7. ये puppies होते ही प्यारे प्यारे हैं.. :))
    ~सादर !!!

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाणभट्ट जी!
    जो घर-दफ्तर, गली-मोहल्ले, सत्ता-विपक्ष हर जगह ऐसे ही वफादार पल रहे हैं वो वफादार नहीं हैं। यदि होते तो...!

    उत्तर देंहटाएं
  9. यह कुत्ता है बड़ा शिकारी।
    बिल्ली का दुश्मन है भारी।।

    शास्त्र जी की रचना फिरंगी ,कंठस्थ करने लायक बाल गीत है आजकल तो सरकार ही फिरंगी और फरंड हो रही है .आम आदमी का यह हाल बना रखा है इसने -

    ज़ुल्म की मुझ पे इंतिहा कर दे ,

    मुझसा ,बे -जुबां ,फिर कोई ,मिले ,न मिले .

    उत्तर देंहटाएं
  10. सुप्रिय चर्चा मंच जी !मांजरा टिपण्णी का स्पैम में चले जाने का कुछ और भी है आज तो हम ने अपना लिंक लगाने की गलती भी नहीं की है . फिर भी शास्त्री जी के बाल गीत फिरंगी पर की गई टिपण्णी दोनों जगह से गायब हो गई ,हमारे देखते देखते और हम डूबते को बचा न सके .लो फिर पोस्ट करते हैं

    .शास्त्र जी की रचना फिरंगी ,कंठस्थ करने लायक बाल गीत है आजकल तो सरकार ही फिरंगी और फरंड हो रही है .आम आदमी का यह हाल बना रखा है इसने -

    ज़ुल्म की मुझ पे इंतिहा कर दे ,

    मुझसा ,बे -जुबां ,फिर कोई ,मिले ,न मिले .

    उत्तर देंहटाएं

  11. दो-एक तस्वीरें, रसीदें व आयोजनों के झूठे-सच्चे आंकड़े
    उफ़ ! ये, खुद की नजर में, खुद की बेगुनाही के सबूत हैं ?
    प्रस्तुतकर्ता उदय - uday
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    लेबल: शेर(शैर )........शैर

    भाई साहब पूरी गजल ही काबिले दाद है .क्या मतला क्या मक्ता .हिन्दुस्तान का आम आदमी इनके बारे में कैसे सोचता है -देखिये

    जुल्म की मुझ पर इन्तहा कर दे ,

    मुझसा बे -जुबां कोई मिले न मिले .

    माननीय चर्चा मंच !विश्वस्त सूत्रों से पता चला है ,इस दौरान टिप्पणियों के स्पैम बोक्स में जाने की एक बड़ी वजह यह बनी है कि मेरे जैसे लोग अपने लिंक टिपण्णी के संग साथ चेप रहे थे .

    विज्ञापन और टिपण्णी का घालमेल इसकी वजह बना है .

    आइन्दा के लिए गिरह बाँध ली (गांठ बाँध ली ,गिरह कट तो अब कांग्रेसी कहलाते हैं .)

    यह कुत्ता है बड़ा शिकारी।
    बिल्ली का दुश्मन है भारी।।

    शास्त्र जी की रचना फिरंगी ,कंठस्थ करने लायक बाल गीत है आजकल तो सरकार ही फिरंगी और फरंड हो रही है .आम आदमी का यह हाल बना रखा है इसने -

    ज़ुल्म की मुझ पे इंतिहा कर दे ,

    मुझसा ,बे -जुबां ,फिर कोई ,मिले ,न मिले .

    भोगे हुए बोझिल पल क्षणों की रचना .

    दुःख से बोझिल रचना ,

    दुःख निस्संगता का ,निरपेक्ष रह जाने का ,सरकार भी इस दौर में निरपेक्ष हो चली है .निरपेक्ष का मतलब होता है जिसका खुद के अलावा किसी से सम्बन्ध न हो .नॉट रिलेटिड टू एनीथिंग एक्सटर्नल .
    आज़ादी ही तो है
    जब सारे रिश्तों से मुक्ति मिल जाए
    यूँ भी
    नाते मुफ़्त में जुड़ते कहाँ है ?
    स्वाभिमान का अभिनय
    आखिर कब तक ?
    आज़ादी ही तो है
    जब सारे रिश्तों से मुक्ति मिल जाए
    यूँ भी
    नाते मुफ़्त में जुड़ते कहाँ है ?
    स्वाभिमान का अभिनय
    आखिर कब तक ?

    बधाई जेन्नी शबनम जी .

    सुप्रिय चर्चा मंच जी !मांजरा टिपण्णी का स्पैम में चले जाने का कुछ और भी है आज तो हम ने अपना लिंक लगाने की गलती भी नहीं की है . फिर भी शास्त्री जी के बाल गीत फिरंगी पर की गई टिपण्णी दोनों जगह से गायब हो गई ,हमारे देखते देखते और हम डूबते को बचा न सके .लो फिर पोस्ट करते हैं

    .शास्त्र जी की रचना फिरंगी ,कंठस्थ करने लायक बाल गीत है आजकल तो सरकार ही फिरंगी और फरंड हो रही है .आम आदमी का यह हाल बना रखा है इसने -

    ज़ुल्म की मुझ पे इंतिहा कर दे ,

    मुझसा ,बे -जुबां ,फिर कोई ,मिले ,न मिले .

    देवेन्द्र पांडे जी गर खोल लिया टीवी तो सुबहे बनारस का मज़ा जाता रहेगा .चर्चे और चरखे सब जीजाजी के हैं .अभी भी हरीश रावत जी मासूमियत से

    अशोक खेमका को कह रहें हैं -लोकतंत्र में कौन किसको मरवाता है .मरवा सकता है .बेचारे ने यही तो कहा ,चाहे आप मुझे टर्मिनेट करदो या मरवा दो -मैं

    सच को सच कहूंगा .भारत की प्रशासनिक सेवा में होने का मुझे गर्व है ,मेरी निष्ठा इस देश के साथ है किसी सरकार के साथ नहीं है न मैं ने उसकी नीति

    के विषय में कुछ कहा है .मेरा काम है नियमानुसार काम करना वह मैं करता रहूँगा .यह वही अधिकारी है जिसके 20-21 साला सेवा में 42 -43 तबादले

    हो चुके हैं ईमानदार होने की वजह से .

    ज़ाहिर है उन्हें अपनी जान का ख़तरा है .आप कहतें हैं लोकतंत्र में कौन किसको मारता है हम बतलातें हैं -

    प्रवीर देव भंज देव ,अलवर के राजा (आपने जोंगा जीप का विरोध किया था ),नागरवाला (आपात काल के दौरान मरवाए गए थे ,माताजी ने 70 लाख

    रुपया बैंक से अपने हस्ताक्षर करके निकाला था नागरवाला पुष्टि को तैयार थे .),श्यामा प्रसाद मुखर्जी साहब ,सभी मरवाए गए थे इसी लोकतंत्र में .अब

    केजरी -वार (केजरीवाल नहीं

    )सरकार के गले की हड्डी बना है .

    मैं सुबहे बनारस को रसहीन क्यों बनाऊं ?

    ये नौ शिव शक्तियां हैं फिर आज़ाद भारत में आज सुरक्षित नहीं हैं .नटराज का नारीश्वर भी यहीं हैं .बिग बैंग, शिव का तांडव भी है सृष्टि का किर्येशन भी

    हैं . .

    मुरझा गेन हैं कलियाँ बिन बागवान के ,बढ़िया पाए की गज़ल है .चर्चा मंच के लिंक में कालियां छप गया है .

    एक गड्ढा जो बहुत दिनों से ......दिनो ठीक कर लें ..............बढ़िया कटाक्ष है .

    दुर्मिल सवैया रूप अर्थ गाम्भीर्य में भी उत्तम है रूप में भी .भाई साहब हिंदी में तो यह शब्द सुसराल है क्या ससुराल जन रूप है आंचलिक प्रयोग है .सास

    सुसर ,सुसरा आदि बोली खड़ी बोली में प्रचलित हैं .
    शास्त्री जी ये तमाम टिप्पणिया वह टिपण्णी खोरी स्पैम बोक्स गटक चुका है आपका भी ,चर्चा मंच का भी .अब बताइये क्या करें .

    उत्तर देंहटाएं
  12. शास्त्री जी ये तमाम टिप्पणिया वह टिपण्णी खोरी स्पैम बोक्स गटक चुका है आपका भी ,चर्चा मंच का भी .अब बताइये क्या करें .

    उत्तर देंहटाएं
  13. वीरेंद्र जी देखिये तो कहीं फिरंगी तो नहीं गायब कर रहा है आपकी टिप्पणियाँ :))

    बहुत सुंदर !

    उत्तर देंहटाएं
  14. बहुत सुन्दर कविता, हमारे भी घर पालतू हैं।

    उत्तर देंहटाएं

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