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गुरुवार, 3 जनवरी 2013

"मेरा एक पुराना गीत" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

  
अब हवाओं में फैला गरल ही गरल।
क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में गजल।।

गन्ध से अब, सुमन की-सुमन है डरा,
भाई-चारे में, कितना जहर है भरा,
वैद्य ऐसे कहाँ, जो पिलायें सुधा-
अब तो हर मर्ज की है, दवा ही अजल।
क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में गजल।।

धर्म की कैद में, कर्म है अध-मरा,
हो गयी है प्रदूषित, हमारी धरा,
पंक में गन्दगी तो हमेशा रही-
अब तो दूषित हुआ जा रहा, गंग-जल।
क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में गजल।।

आम, जामुन जले जा रहे, आग में,
विष के पादप पनपने, लगे बाग मे,
आज बारूद के, ढेर पर बैठ कर-
ढूँढते हैं सभी, प्यार के चार पल।
क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में गजल।।

शिव अभयदान दो, आज इन्सान को,
जग की यह दुर्गति देखकर, हे प्रभो!
नेत्र मेरे हुए जा रहे हैं, सजल।
क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में गजल।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. पोस्ट दिल को छू गयी.कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने.बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं
  2. पूरे माहौल को आज भी समेटे है यह गजल .आभार .

    उत्तर देंहटाएं
  3. किसी के चले जाने से यह दुनिया भला कब रुकी है जो अब रुकेगी, वो कहते है न "द शो मस्ट गो ऑन"

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  5. ऐसी स्तब्धता में भाव नहीं बह पाते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  6. शिव अभयदान दो, आज इन्सान को,
    जग की यह दुर्गति देखकर, हे प्रभो!
    नेत्र मेरे हुए जा रहे हैं, सजल।
    क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में गजल।।


    बहुत खूब ...उम्दा

    उत्तर देंहटाएं
  7. अन्‍दर तक झकझोरने वाली रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  8. अब हवाओं में फैला गरल ही गरल।
    क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में गजल।।

    भावपूर्ण रचना.....

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत खूब ...उम्दा प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  10. क्या लिखूँ ऐसे परिवेश में गजल।।.....haan, wakayee samay ki kathin dhara bah rahi hai.....

    उत्तर देंहटाएं

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