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मंगलवार, 8 जनवरी 2013

"चाय और आग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
धूप नहीं नभ में खिली, अंग ठिठुरता जाय।
सर्दी में दे ऊर्जा, गर्म-गर्म इक चाय।१।
आग सेंकने का चढ़ा, देखो कैसा चाव।
सर्दी में अच्छा लगे, जलता हुआ अलाव।२।
ठिठुरन से जमने लगा, सारे तन का खून।
शीतल ऋतु में आग से, मिलता बहुत सुकून।३।
 
बच्चे-बूढ़े आग को, सेंक रहे हैं आज।
भीषण शीत-प्रकोप से, ठिठुरा सकल समाज।४।
पहरा देते रातभर, कभी न मानें हार। 
आग सेंकने आ गये, अब ये चौकीदार।५।

11 टिप्‍पणियां:

  1. आगे करके हाथ दो, सेंक रहे हैं आग ।

    शीत-लहर कटु गलन अति, जमते नदी तड़ाग ।

    जमते नदी तड़ाग, गर्म कर चाय सुड़कते ।

    रहे आग को खोद, आग फिर भी नहिं भड़के ।

    दिल्ली दुर्जन आग, बदन में ऐसी लागे ।

    करके निकृष्ट-पाप, कहीं पावे नहिं भागे ।।

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  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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  3. बहुत खूब...मुझे तो तस्‍वीर देखकर और ठंड लगने लगी

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (09-01-13) के चर्चा मंच पर भी है | अवश्य पधारें |
    सूचनार्थ |

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  5. तसवीरें देखकर गर्मी आ गई ! मौसम गुनगुना हो उठा !

    उत्तर देंहटाएं
  6. एक ओर ताप और साथ में चाय का साथ ...बहुत बढिया तालमेल

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  7. प्राणि मात्र के प्रति प्रेम से आप्लावित दोहे .

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  8. वाह बहुत लिखा है...बचपन की सारी अनुभूतियाँ लौट आयी मन में.

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  9. चाय पीते पीते पढ़ने का आनन्द ही अलग है..

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