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मंगलवार, 15 जनवरी 2013

"ऊसर ज़मीन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


ऊसर जमीन में हम, उपहार बो रहे हैं।
हम गीत और ग़ज़ल के उदगार ढो रहे हैं।।

बन कर सजग सिपाही, हम दे रहे हैं पहरे,
हम मेटने चले हैं, पर्वत के दाग गहरे,
उनको जगा रहे हैं, थककर जो सो रहे हैं।
हम गीत और ग़ज़ल के उदगार ढो रहे हैं।।

तूफान आँधियों में, हमने दिये जलाये,
फानूस बन गये हम, जब दीप झिलमिलाये,
उनको गले लगाते, जो ख़ार हो रहे हैं।
हम गीत और ग़ज़ल के उदगार ढो रहे हैं।।

मनके सभी पिरोये, टूटे सुजन मिलाये.
वीरान वाटिका में, रूठे सुमन खिलाये,
माला के तार में हम, अब प्यार पो रहे हैं।
हम गीत और ग़ज़ल के उदगार ढो रहे हैं।।

13 टिप्‍पणियां:

  1. माला के तार में हम, अब प्यार पो रहे हैं।kya baat kahe....wah.

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  2. सुन्दर सरल अभिव्यक्ति सरजी .

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर विचार |
    सस्वर पढ़ा -
    आभार गुरु जी-

    उत्तर देंहटाएं
  4. माला के तार में हम, अब प्यार पो रहे हैं।
    हम गीत और ग़ज़ल के उदगार ढो रहे हैं।।...बहुत खुबसूरत भाव...आभार

    उत्तर देंहटाएं
  5. "बन कर सजग सिपाही, हम दे रहे हैं पहरे,
    हम मेटने चले हैं, पर्वत के दाग गहरे,
    उनको जगा रहे हैं, थककर जो सो रहे हैं।"

    उत्तर देंहटाएं
  6. काट लिये सब पेड़ धरा से,
    प्यारी छाँह कहाँ से लायें..

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत प्रभावी प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं

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