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शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

"सामयिक दोहे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

कोयल और कबूतरी, नहीं सुरक्षित आज।
वर्तमान परिपेक्ष्य में, दूषित हुआ समाज।१।

इंसानों के अंग में, बढ़ी हुई है खाज।
प्रदूषण के दौर में, करना कठिन इलाज़।२।

बदल गये हैं ढंग सब, बदले रीति-रिवाज।
रिश्तों-नातों का नहीं, कोई मतलब आज।३।

समय भोग का चल रहा, नहीं योग का काल।
मानवता का चेहरा, हुआ बहुत विकराल।४।

अपनी माता के वसन, लोग रहे हैं नोच।
आज सपूतों की हुई, कितनी गन्दी सोच।५।

15 टिप्‍पणियां:


  1. सामयिक दोहे ना -बालिग़ -वयस्कों को ललकारते .

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  2. सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको

    उत्तर देंहटाएं
  3. दुखी कर गयी पिछले वर्ष की घटनायें।

    उत्तर देंहटाएं
  4. भावनात्मक सार्थक अभिव्यक्ति ..आभार

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुन्दर रचना,सार्थक अभिव्यक्ति,प्रभावशाली प्रस्तुति, बदल गये हैं ढंग सब, बदले रीति-रिवाज।
    रिश्तों-नातों का नहीं, कोई मतलब आज।३।

    समय भोग का चल रहा, नहीं योग का काल।
    मानवता का चेहरा, हुआ बहुत विकराल।४।

    अपनी माता के वसन, लोग रहे हैं नोच।
    आज सपूतों की हुई, कितनी गन्दी सोच।५।

    उत्तर देंहटाएं
  6. सार्थक अभिव्यक्ति,प्रभावशाली .......

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुन्दर सार्थक प्रभावशाली अभिव्यक्ति, ..आभार..

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत बढ़िया प्रस्तुति .आपकी सद्य टिपण्णी हमारी महत्वपूर्ण धरोहर है .


    अपनी माता के वसन, लोग रहे हैं नोच।
    आज सपूतों की हुई, कितनी गन्दी सोच।५।

    उत्तर देंहटाएं

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