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रविवार, 30 जून 2013

"दोहे-तुलसी, सूर-कबीर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कालजयी साहित्य दे, चलते बने फकीर।
नहीं डॉक्टर बन सके, तुलसी, सूर-कबीर।१।

आगे जिसके नाम के, लगा डॉक्टर होय।
साहित्य के नाम पर, समझो उसे गिलोय।२।

छन्दशास्त्र का है नहीं, जिनको कुछ भी ज्ञान।
वो कविता के क्षेत्र में, पा जाते सम्मान।३।

लिखकर के आलेख को, अनुच्छेद में बाँट।
हींग लगे ना फिटकरी, कविता बने विराट।४।

भूल गये अपनी विधा, चमक-दमक में आज।
पड़ा विदेशी मोह में, आज प्रबुद्ध समाज।५।

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर,सार्थक और सटीक दोहे, आभार ।

    जवाब देंहटाएं
  2. लिखकर के आलेख को, अनुच्छेद में बाँट।
    हींग लगे ना फिटकरी, कविता बने विराट,,,,,,सटीक बात...

    RECENT POST: ब्लोगिंग के दो वर्ष पूरे,

    जवाब देंहटाएं
  3. छन्दशास्त्र का है नहीं, जिनको कुछ भी ज्ञान।
    वो कविता के क्षेत्र में, पा जाते सम्मान।३।
    ekdam sahi .nice presentation .

    जवाब देंहटाएं

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