कुछ शब्दचित्र बरसात बीत गई है गंगाराम सुबह-सवेरे उठकर अपने एक अदद मरियल टट्टू को लेकर चल पड़ा है दूर मिट्टी की खदान पर -- अब वह लौट आया है मिट्टी की एक खेप लेकर रामकली ने दो रोटी और चटनी उसको परोस दी है यही तो छप्पन-भोग है गंगाराम का -- अब राम कली ने नल की हत्थी संभाल ली है सात साल की रेखा और दस साल का चरन प्लास्टिक की छोटी सी बाल्टी से गंगाराम द्वारा लाई गई मिट्टी को भिगोने में लगे हैं -- गंगाराम पैरों से गीली मिट्टी को गूँथ रहा है रामकली मिट्टी के पिण्डे बनाने में लगी है -- आँगन में गुनगुनी धूप में बिछा हैं चाक छोटे-छोटे दीप सजे हैं यही तो हैं इनकी दिवाली कच्चे दीपक लगते हैं प्यारे यही तो हैं पूरे परिवार की आँखों के तारे -0-0-0-0-0- |
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रविवार, 31 अक्टूबर 2010
“आँखों के तारे!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
शनिवार, 30 अक्टूबर 2010
"चिड़ियों की कारागार में पड़े हुए हैं बाज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
- "एक पुरानी रचना"निर्दोष से प्रसून भी डरे हुए हैं आज।चिड़ियों की कारागार में पड़े हुए हैं बाज।अश्लीलता के गान नौजवान गा रहा,चोली में छिपे अंग की गाथा सुना रहा,भौंडे सुरों के शोर में, सब दब गये हैं साज।चिड़ियोंकीकारागार में पड़े हुए हैं बाज।।
श्वान और विडाल जैसा मेल हो रहा,
नग्नता, निलज्जता का खेल हो रहा,
कृष्ण स्वयं द्रोपदी की लूट रहे लाज।
चिड़ियों की कारागार में पड़े हुए हैं बाज।।
भटकी हुई जवानी है भारत के लाल की,
ऐसी है दुर्दशा मेरे भारत - विशाल की,
आजाद और सुभाष के सपनों पे गिरी गाज।
चिड़ियों की कारागार में पड़े हुए हैं बाज।।
लिखने को बहुत कुछ है अगर लिखने को आयें,
लिख -कर कठोर सत्य किसे आज सुनायें,
दुनिया में सिर्फ मूर्ख के, सिर पे धरा है ताज।
चिड़ियों की कारागार में पड़े हुये हैं बाज।।
रोती पवित्र भूमि, आसमान रो रहा,
लगता है, घोड़े बेच के भगवान सो रहा,
अब तक तो मात्र कोढ़ था, अब हो गयी है खाज।
चिड़ियों की कारागार में पड़े हुए हैं बाज।।
शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010
“…ढूँढने निकला हूँ!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
ईमान ढूँढने निकला हूँ, मैं मक्कारों की झोली में। बलवान ढूँढने निकला हूँ, मैं मुर्दारों की टोली में। ताल ठोंकता काल घूमता, बस्ती और चौराहों पर, कुछ प्राण ढूँढने निकला हूँ, मैं गद्दारों की गोली में। आग लगाई अपने घर में, दीपक और चिरागों ने, सामान ढूँढने निकला हूँ, मैं अंगारों की होली में। निर्धन नहीं रहेगा कोई, खबर छपी अख़बारों में, अनुदान ढूँढने निकला हूँ, मैं सरकारों की बोली में। सरकण्डे से बने झोंपड़े, निशि-दिन लोहा कूट रहे, आराम ढूँढने निकला हूँ, मैं बंजारों की खोली में। यौवन घूम रहा बे-ग़ैरत, हया-शर्म का नाम नहीं, मुस्कान ढूँढने निकला हूँ, मैं बाजारों की चोली में। बोतल-साक़ी और सुरा है, सजी हुई महफिल भी है, सुखधाम ढूँढने निकला हूँ, मैं मधुशाला की डोली में। विकृतरूप हुआ लीला का, राम-लखन हैं व्यभिचारी, भगवान ढूँढने निकला हूँ, मैं कलयुग की रंगोली में। |
गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010
“सभ्यताओं का अन्तर!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
किसी ज़माने में गाली था इंसान को जानवर कहना -- और अब जानवरों को गाली देना है इंसान को जानवर कहना लेकिन पशुओं की नियति है चुपचाप सब कुछ सहना -- क्योंकि अब जानवर सभ्य है और आदमी असभ्य है नियम से रहता है कुछ नही कहता है -- यही तो अन्तर है सभ्यताओं का! |
बुधवार, 27 अक्टूबर 2010
"मेरे प्रियतम तुम्ही मेरी आराधना!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
सोमवार, 25 अक्टूबर 2010
“आ भी आओ चन्द्रमा…!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
रविवार, 24 अक्टूबर 2010
“… ..मंजिल पूरी!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
शनिवार, 23 अक्टूबर 2010
“खुदा भी सिर झुकाता है-एक पुरानी ग़ज़ल” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010
"सुमन दुनिया को छलता है!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
- मखमली सा ख्वाब, हर दिल में मचलता है।गन्ध से अपनी सुमन, दुनिया को छलता है।रात हो, दिन हो, उजाला या अन्धेरा हो,पुष्प के सौन्दर्य पर, षटपद मचलता है।गन्ध से अपनी सुमन, दुनिया को छलता है।।जेठ की दोपहर हो या माघ की शीतल पवन,प्रेम का सूरज हृदय से ही निकलता है।गन्ध से अपनी सुमन, दुनिया को छलता है।।रास्ते होगें अलग, पर मंजिलें तो एक हैं,लक्ष्य पाने को सफर दिन-रात चलता है।गन्ध से अपनी सुमन, दुनिया को छलता है।।आँधियाँ हरगिज बुझा सकती नही नन्हा दिया,प्यार का दीपक, हवा में तेज जलता है।गन्ध से अपनी सुमन, दुनिया को छलता है।।(चित्र गूगल छवि से साभार)
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