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सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

“तम ने घेरा डाला मन में!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

cactasपुष्प खिले हैं बहुत चमन में।
किन्तु ताजगी नहीं सुमन में।

सूरज मुँह दुबकाये फिरता,
बादल छाये नील गगन में।

ममता गई काम पर अपने,
बिलख रहा बचपन आँगन में।

हा-हाकार खेलता होली,
सुख गायब है आज वतन में।

सीताओं की लाज लुट रही,
असभ्यता है राम-लखन में।

बस कहने भर को बसन्त है,
विष के वृक्ष उगे कानन में।

कोई किरण नजर नही आती,
तम ने घेरा डाला मन में।
(चित्र गूगल छवि से साभार)

19 टिप्‍पणियां:

  1. हा-हाकार खेलता होली,
    सुख गायब है आज वतन में।

    सीताओं की लाज लुट रही,
    असभ्यता है राम-लखन में।

    Bahut sundar shashtri ji.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेहतरीन रचना ! आज के हालात को बयां करती हुई ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बस कहने भर को बसन्त है,
    विष के वृक्ष उगे कानन में।
    आज के सच को आपने दो पंक्तियों में अभिव्यक्त कर दिया।

    उत्तर देंहटाएं
  4. अति सुन्दर प्रस्तुति . धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  5. सीताओं की लाज लुट रही,
    असभ्यता है राम-लखन में।
    बड़े असाधारण अर्थ लिए हुए हैं ..... प्रभावी रचना ....

    उत्तर देंहटाएं
  6. सीताओं की लाज लुट रही,
    असभ्यता है राम-लखन में।

    behtareen rachna....
    badhai..

    उत्तर देंहटाएं
  7. बस कहने भर को बसन्त है,
    विष के वृक्ष उगे कानन में।

    बस अब जीवन का सत्य यही रह गया है और जो भी कविता में समेटा है वह कटु सत्य हम जी रहे हैं और पता नहीं ये कभी ख़त्म भी होगा या फिर और घने कोहरे कि तरह हमारे गिर्द छा जायेगा.

    उत्तर देंहटाएं
  8. तम ने घेरा डाला मन में ...!
    आज के हालत बयान करता गीत ..

    उत्तर देंहटाएं
  9. सीताओं की लाज लुट रही,
    असभ्यता है राम-लखन में।

    kya baat hai guru ji...sateek prahaar!

    उत्तर देंहटाएं
  10. हा-हाकार खेलता होली,
    सुख गायब है आज वतन में।
    आपके मन की व्यथा से हम एक मत हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  11. सीताओं की लाज लुट रही,
    असभ्यता है राम-लखन में।

    बस कहने भर को बसन्त है,
    विष के वृक्ष उगे कानन में।

    पूरी रचना ही आईना दिखाती प्रतीत हो रही है………………रचना के पोर पोर से दर्द ही दर्द बह रहा है…………बेहतरीन रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  12. हा-हाकार खेलता होली,
    सुख गायब है आज वतन में।

    सीताओं की लाज लुट रही,
    असभ्यता है राम-लखन में।

    इस कविता को पढ कर लगा मानो किसी पुरानी पुसतक की कविता पढ रहा हूं... आम सरोकार की कविता कम ही लिखी जा रही है आज कल... सुन्दर कविता

    उत्तर देंहटाएं
  13. हा-हाकार खेलता होली,
    सुख गायब है आज वतन में।


    -यही हालात हैं..बहुत खूब उकेरा.

    उत्तर देंहटाएं
  14. मयंक जी
    मन भावन रचना है.
    ममता गई काम पर अपने,
    बिलख रहा बचपन आँगन में।
    आपका
    -विजय तिवारी " किसलय " जबलपुर // हिन्दी साहित्य संगम जबलपुर

    उत्तर देंहटाएं
  15. tam ne dala ghera man me...padhkar bahut achcha laga.aapki sabhi rachnayen ek se adhkar ek hain.

    उत्तर देंहटाएं

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