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सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

"बन्दर की व्यथा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

बहुत दिनों से "उच्चारण" पर
बच्चों के लिए कुछ नही लगा पाया हूँ!
आज "बन्दर की व्यथा" शीर्षक से 
प्रस्तुत है यह बालगीत -

"बन्दर की व्यथा"

बिना सहारे और सीढ़ी के,
झटपट पेड़ों पर चढ़ जाता।
गली मुहल्लों और छतों पर,
खों-खों करके बहुत डराता।

कोई इसको वानर कहता,
कोई हनूमान बतलाता।
मानव का पुरखा बन्दर है,
यह विज्ञान हमें सिखलाता।

लाठी और डुगडुगी लेकर,
इसे मदारी खूब नचाता।
यह करतब से हमें हँसाता,
पैसा माँग-माँग कर लाता।

जंगल के आजाद जीव को,
मानव देखो बहुत सताता।
देख दुर्दशा इन जीवों की,
तरस हमें इन पर है आता।।
(चित्र गूगल छवि से साभार)

22 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढियाँ.
    बन्दर वैसे भी बच्चों को बहुत भाता है.

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  2. इसे झूम-झूम कर गाने और गा-गा कर झूमने का मन कर गया।

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह चित्रों के साथ बन्दर गीत बहुत बढ़िया रहा.

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुंदर। बच्चों को भाने और याद हो जाने वाला बालगीत।

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ शानदार रचना! बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर बाल गीत है . फोटो भी जोरदार लगाए हैं .. पढ़कर बचपना याद आ गया... सुन्दर प्रस्तुति ...आभार

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाह कितनी अच्छी कविता .... आपने फोटो भी बड़े मजेदार लगाये हैं....

    उत्तर देंहटाएं
  8. सभी जानवर परेशान हैं, नर-पशुओं को छोड़कर..

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत सुन्दर लगा बाल गीत, और इन बंदरो की तस्वीर और भी अच्छी...
    regards

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  10. आजकल कहाँ नजर आते हैं मदारी , और कहाँ बच्चों को इतनी फुर्सत ...

    सुन्दर बाल गीत ..!

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  11. यह बानर-गीत तो मजेदार है...चित्र भी लाजवाब.

    उत्तर देंहटाएं
  12. बेहद सुन्दर बाल गीत चित्रो के साथ बहुत सुन्दर लगा।

    उत्तर देंहटाएं
  13. बन्दर विषयक ऐसा गीत पहली बार पढ़ा.

    उत्तर देंहटाएं
  14. मुझे हमेशा बच्चों के लिए लिखना बहुत कठिन काम लगता है । आप इतनी सहजता से कैसे लिख लेते हैं ।

    उत्तर देंहटाएं
  15. बहुत ही सहज सरल भोली अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं

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