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सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

“आ भी आओ चन्द्रमा…!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

moon&starssamll थक गईं नजरें तुम्हारे दर्शनों की आस में।
आ भी आओ चन्द्रमा तारों भरे आकाश में।।

चमकते लाखों सितारें किन्तु तुम जैसे कहाँ,
साँवरे के बिन कहाँ अटखेलियाँ और मस्तियाँ,
गोपियाँ तो लुट गईं है कृष्ण के विश्वास में।
आ भी आओ चन्द्रमा तारों भरे आकाश में।।

आ गया मौसम गुलाबी, महकता सारा चमन,
छेड़ती हैं साज लहरें, चहकता है मन-सुमन,
पुष्प, कलिकाएँ, लताएँ मग्न हैं परिहास में।
आ भी आओ चन्द्रमा तारों भरे आकाश में।।

आज करवाचौथ पर मन में हजारों चाह हैं,
सब सुहागिन तक रही केवल तुम्हारी राह हैं,
चाहती हैं सजनियाँ साजन बसे हों पास में।
आ भी आओ चन्द्रमा तारों भरे आकाश में।।

16 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ! बहुत सुन्दर गीत रचा है कल तो चाँद की सबसे ज्यादा अहमियत होनी है और यही हर दिल की पुकार होगी।

    उत्तर देंहटाएं
  2. "आज करवाचौथ पर मन में हजारों चाह हैं,
    सब सुहागिन तक रही केवल तुम्हारी राह हैं,
    चाहती हैं सजनियाँ साजन बसे हों पास में।
    आ भी आओ चन्द्रमा तारों भरे आकाश में।।"
    बहुत हृदयस्पर्शी और सुंदर गीत.. मैं गुनगुना रहा हूँ इसे...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर रचना, हमारे यहां तो बहुत बादल हे बर्फ़ वारी ओर बरसात के कारण, लेकिन कल के चांद की हम सब को इंतजार हे, हमे भी

    उत्तर देंहटाएं
  4. chhanda aur laya se bandhi ek sampoorna kavita ....bahut sundar

    उत्तर देंहटाएं
  5. शास्त्री जी, क्या बात है, गोपियां तो लुट गई हैं कृष्ण के विश्वास में ..... बहुत सुंदर प्रस्तुति। सरस, मन भावन।
    समकालीन डोगरी साहित्य के प्रथम महत्वपूर्ण हस्ताक्षर : श्री नरेन्द्र खजुरिया

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपको दीप पर्व की सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएँ !

    कल 25/अक्तूबर/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं

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