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शनिवार, 23 अक्तूबर 2010

“खुदा भी सिर झुकाता है-एक पुरानी ग़ज़ल” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)


खुदा सबके लिए ही, खूबसूरत जग बनाता है। 
मगर इस दोजहाँ में, स्वार्थ क्यों इतना सताता है? 

पड़ा जब काम तो, रिश्ते बने मजबूत और गहरे, 
निकल जाने पे मतलब, भंग सम्बन्धों का नाता है। 

है जब तक गाँठ में ज़र, मान और सम्मान है तब तक, 
अगर है जेब खाली तो, जगत मूरख बताता है।

कहीं से कुछ उड़ा करके, कहीं से कुछ चुरा करके,
 सुनाता जो तरन्नुम में, वही शायर कहाता है।   

जरा बल हुआ कम तो, तिफ्ल भी होने लगे तगड़े,
मगर बलवान के आगे, खुदा भी सिर झुकाता है।
(चित्र गूगल छवि से साभार)

17 टिप्‍पणियां:

  1. शास्त्रीजी,
    पुरानी होकर भी कितनी ताज़ा है ! कड़वी सच्चाइयां बल खाकर मुखर हुई हैं :
    'अगर है जेब खाली तो जगत मूरख बताता है !'
    पुराने चावल जब चूल्हे पर चढ़ते हैं, तो घर-भर में अपनी सुगंध फैला देते हैं ! बहुत खूब ! बधाइयाँ !
    साभिवादन--आ.

    उत्तर देंहटाएं
  2. खुदा सबके लिए ही, खूबसूरत जग बनाता है।
    मगर इस दोजहाँ में, स्वार्थ क्यों इतना सताता है ?

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति सर ...आभार

    उत्तर देंहटाएं
  3. पड़ा जब काम तो, रिश्ते बने मजबूत और गहरे,
    निकल जाने पे मतलब, भंग सम्बन्धों का नाता है।
    सत्य सुन्दरता से व्यक्त हुआ है!
    आभार!!!

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सटिकता से कही गई बात.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  5. डॉ शास्त्री जी !! इतनी सुन्दर रचना जो हर लिहाज से पूर्ण है और हमेशा ताज़ी रहेगी .. आत्म मंथन के लिए मजबूर करेगी .....

    उत्तर देंहटाएं
  6. वटवृक्ष में मेरी कविता " खुद से खुद की बातें " आपने पसंद कीं और टिपण्णी की - धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत बढ़िया गज़ल लेकिन एक शेर और चाहिये था ।

    उत्तर देंहटाएं
  8. हमने तो पहली बार पढी है हमारे लिये नई ही है। बहुत खूब अशार हैं। बधाई।

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  9. आज की सचाई लिये हे आप् की यह रचना, धन्यवाद

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  10. नई सी ताजगी लिए विचारों की.. प्रेरणा की.. नई सी ग़ज़ल हमारे लिए

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  11. शरद कोकास जी!
    आपकी फरमाइश पर गजल के चार मिसरे पूरे कर दिये हैं!

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  12. यथार्थ व्यक्त करती,बहुत अच्छी ग़ज़ल .....ये शायर से इतनी नाराज़गी क्यों है :)

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  13. ye utni hi taazi hai jitni purane dinon se judi yaadein ... bahut sunder rachna shastri ji ...

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  14. जीवन की हकीकत समेटे हुए एक संवेदनशील रचना ......

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  15. इन नकली उस्ताद जी से पूछा जाये कि ये कौन बडा साहित्य लिखे बैठे हैं जो लोगों को नंबर बांटते फ़िर रहे हैं? अगर इतने ही बडे गुणी मास्टर हैं तो सामने आकर मूल्यांकन करें।

    स्वयं इनके ब्लाग पर कैसा साहित्य लिखा है? यही इनके गुणी होने की पहचान है। अब यही लोग छदम आवरण ओढे हुये लोग हिंदी की सेवा करेंगे?

    उत्तर देंहटाएं

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