"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

रविवार, 31 अक्तूबर 2010

“आँखों के तारे!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

कुछ शब्दचित्र

बरसात
बीत गई है
गंगाराम
सुबह-सवेरे उठकर
अपने एक अदद
मरियल टट्टू को लेकर
चल पड़ा है
दूर मिट्टी की खदान पर
--
अब वह लौट आया है
मिट्टी की
एक खेप लेकर
रामकली ने
दो रोटी और चटनी
उसको परोस दी है
यही तो छप्पन-भोग है
गंगाराम का
--
अब राम कली ने
नल की हत्थी
संभाल ली है
सात साल की रेखा
और
दस साल का चरन
प्लास्टिक की
छोटी  सी बाल्टी से
गंगाराम द्वारा लाई गई 
मिट्टी को भिगोने में लगे हैं
--
गंगाराम पैरों से
गीली मिट्टी को
गूँथ रहा है
रामकली
मिट्टी के पिण्डे
बनाने में लगी है
--
आँगन में गुनगुनी धूप में
बिछा  हैं  चाक
छोटे-छोटे दीप सजे हैं
यही तो हैं
इनकी दिवाली
कच्चे दीपक
लगते हैं प्यारे
यही तो हैं
पूरे परिवार की
आँखों के तारे
-0-0-0-0-0-

22 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (1/11/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

    एक बेहतरीन रचना बहुत कुछ कह गयी।

    उत्तर देंहटाएं
  2. यही तो हैं
    इनकी दिवाली
    sundar!
    tyohaaron ke arth bhi bhinn hai sabon ke liye apni sthitiyon paristhitiyon ke aadhar par..

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह, दीप तले अंधेरा क्या होता है, इस रचना के ज़रिए आपने प्रकाश डाला।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेहतरीन शब्दचित्र...शुभ दीपावली...

    उत्तर देंहटाएं
  5. ,
    आजकी रचनाएँ बहुत अच्छी लगीं बधाई |
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत संवेदनशील ...कोरे दिए से ही मनेगी इनकी दीपावली ...बस सब बिक जाएँ .

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुंदर वर्णन उस दिए बनाने वाले की दीपावली का.

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुंदर संदेश देती हे आप की यह कविता, धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  9. इनकी मेहनत से ही हमारी दिवाली रोशन होती है..

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत ख़ूबसूरत और शानदार रचना लिखा है आपने! बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत ही भावमयी और सामाजिक सत्य व्यक्त करती कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत सुंदर और भावमयी रचना शास्त्री जी .... जब दिवाली आती है तभी तो उनकी भी दिवाली होती है ...आभार

    उत्तर देंहटाएं
  13. चलो साल मे एक दिन इन गरीबों की भी चाँदी होते है। उमदा रचना के लिये बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  14. मयंक जी, सचमुच मन को भा गई आपकी कविता। बधाई तो स्‍वीकारनी ही होगी।


    ---------
    मन की गति से चलें...
    बूझो मेरे भाई, वृक्ष पहेली आई।

    उत्तर देंहटाएं
  15. मयंक जी, सचमुच मन को भा गई आपकी कविता। बधाई तो स्‍वीकारनी ही होगी।


    ---------
    मन की गति से चलें...
    बूझो मेरे भाई, वृक्ष पहेली आई।

    उत्तर देंहटाएं
  16. सरल और सहज जीवन की ऐसी सुंदर अभिव्यक्ति आजकल कम ही देखने को मिलती है. एक खूबसूरत और संवेदनशील और मर्मस्पर्शी प्रस्तुति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails