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गुरुवार, 21 अक्तूबर 2010

“सभ्यता से लोग अब लड़ने लगे!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

cowभूख से व्याकुल हुई मैं जा रही हूँ। 
घास के बदले में कूड़ा खा रही हूँ।।
याद आते हैं मुझे वो दिन पुराने।
दूर तक मैदान थे कितने सुहाने।।
cow_open_mouthed_and_reclinedपेट भर चारा उदर में बन्द था।
उस जुगाली में बहुत आनन्द था।।
अब चरागाहों में फैले हैं भवन।
कंकरीटों ने मिटा डाला चमन।।
अब वनों का खो गया अस्तित्व है।
होम सारा हो गया अपनत्व है।।
गाय-भैसों को मनुज खाने लगे।
यूरिया का दूध अपनाने लगे।।
दिल-जिगर के रोग अब बढ़ने लगे।
सभ्यता से लोग अब लड़ने लगे।।
(चित्र गूगल छवि से साभार)

16 टिप्‍पणियां:

  1. सात्विक प्रस्तूति!! शुभेच्छा को प्रणाम!!

    और

    मनुष्य भी कहां बचे जा रहे है।
    धान्य के बदले मवाद खा रहे है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. अब वनों का खो गया अस्तित्व है।
    होम सारा हो गया अपनत्व है।। .....
    बहुत गंभीर गीत! अब प्रकृति, पर्यावरण और आम जन हाशिये पर चले गए हैं...

    उत्तर देंहटाएं
  3. आज के युग का कडवा सच है ये।
    आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (22/10/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  4. गाय-भैसों को मनुज खाने लगे।
    यूरिया का दूध अपनाने लगे।।
    दिल-जिगर के रोग अब बढ़ने लगे।
    सभ्यता से लोग अब लड़ने लगे।।
    और अफ़सोस कि ये इसे पचा भी लेते है !

    उत्तर देंहटाएं
  5. gaay ke madhyam se prakarti aur paryavaran ke vishay me aapne behad achchi rachna likhi hai.her ek rachna prernadayak.

    उत्तर देंहटाएं
  6. सही कहा आप ने स्थिति इतनी ही भयानक हो गई है |

    उत्तर देंहटाएं
  7. सटीक वर्णन आज के हालात का.
    सुंदर रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  8. बड़ी प्रेरणादायी बातें ;

    ग्राम -चौपाल में पधारने के लिए आभार .

    उत्तर देंहटाएं
  9. गाय-भैसों को मनुज खाने लगे।
    यूरिया का दूध अपनाने लगे।।


    बाकि कहने को क्या बचा........

    आपका लेखन सार्थक हुवा.

    उत्तर देंहटाएं
  10. ओह...मन मोह गयी आपकी यह सुन्दर रचना...
    कितना सही कहा आपने....प्रगति का यह रूप सचमुच उद्वेलित कर जाता है...

    समस्या की भयावहता को प्रभावशाली ढंग से रेखांकित करती इस सुन्दर रचना के लिए आपका साधुवाद !!!!

    उत्तर देंहटाएं
  11. एक बहुत कटु सत्य से अवगत करती पोस्ट..

    उत्तर देंहटाएं
  12. इन नकली उस्ताद जी से पूछा जाये कि ये कौन बडा साहित्य लिखे बैठे हैं जो लोगों को नंबर बांटते फ़िर रहे हैं? अगर इतने ही बडे गुणी मास्टर हैं तो सामने आकर मूल्यांकन करें।

    स्वयं इनके ब्लाग पर कैसा साहित्य लिखा है? यही इनके गुणी होने की पहचान है। क्या अब यही लोग छदम आवरण ओढे हुये लोग हिंदी की सेवा करेंगे?

    उत्तर देंहटाएं

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