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शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2010

“…ढूँढने निकला हूँ!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

 ईमान ढूँढने निकला हूँ, मैं मक्कारों की झोली में।
बलवान ढूँढने निकला हूँ, मैं मुर्दारों की टोली में।

ताल ठोंकता काल घूमता, बस्ती और चौराहों पर,
 कुछ प्राण ढूँढने निकला हूँ, मैं गद्दारों की गोली में। 

आग लगाई अपने घर में, दीपक और चिरागों ने,
सामान ढूँढने निकला हूँ, मैं अंगारों की होली में।

निर्धन नहीं रहेगा कोई, खबर छपी अख़बारों में,
अनुदान ढूँढने निकला हूँ, मैं सरकारों की बोली में।

सरकण्डे से बने झोंपड़े, निशि-दिन लोहा कूट रहे, 
आराम ढूँढने निकला हूँ, मैं बंजारों की खोली में।

यौवन घूम रहा बे-ग़ैरत, हया-शर्म का नाम नहीं,
मुस्कान ढूँढने निकला हूँ, मैं बाजारों की चोली में।

बोतल-साक़ी और सुरा है, सजी हुई महफिल भी है,
सुखधाम ढूँढने निकला हूँ, मैं मधुशाला की डोली में।

विकृतरूप हुआ लीला का, राम-लखन हैं व्यभिचारी,
भगवान ढूँढने निकला हूँ, मैं कलयुग की रंगोली में।

24 टिप्‍पणियां:

  1. उत्साह से अनुप्राणित पंक्तियाँ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. ईमान ढूँढने निकला हूँ, मैं मक्कारों की झोली में।
    बलवान ढूँढने निकला हूँ, मैं मुर्दारों की टोली में।

    बहुत सुन्दर !

    उत्तर देंहटाएं
  3. ईमान ढूँढने निकला हूँ, मैं मक्कारों की झोली में।
    बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर भाव समेटे है पंक्तियाँ.....

    उत्तर देंहटाएं
  5. मुस्कान ढूँढने निकला हूँ, मैं बाजारों की चोली में।

    khoobsurat!

    उत्तर देंहटाएं
  6. waah waah

    saamyik paridrishya par itni umda, maar4ak aur sashakt gazal ke liye dhnyavaad aur badhaai shaastri ji !

    jai ho aapki !

    उत्तर देंहटाएं
  7. हम तो ढूँढ ढूँढ कर थक गए मगर कुछ मिला नहीं,
    आराम ढूँढ़ते इनदिनों हम खुद की ही हस्ती में ...

    कविताई तो आपकी जोरदार रही.. लिखते रहिये ....

    उत्तर देंहटाएं
  8. तलाश कभी तो पूरी होगी...
    सुंदर पंक्तियां।

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत बढ़िया... बलवान ढ़ूंढने निकला हूं..

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत सुंदर भाव समेटे है पंक्तियाँ....

    उत्तर देंहटाएं
  11. कितने बर्षों से मैं ढ़ूँढ़ा कुछ भी नहीं मिला
    अरमान ढ़ूँढने निकला हूँ रूपचन्द की बोली में
    सादर
    श्यामल सुमन
    www.manoramsuman.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  12. ईमान ढूँढने निकला हूँ, मैं मक्कारों की झोली में....

    बहुत सुंदर भाव लिए है रचना

    उत्तर देंहटाएं
  13. कहाँ मिल पायेगा यह सब ? अच्छी प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  14. किन शब्दो मे तारीफ़ करूँ……………आज का कटु सत्य बयान कर दिया………………बेहद उम्दा प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  15. निर्धन नहीं रहेगा कोई, खबर छपी अख़बारों में,
    अनुदान ढूँढने निकला हूँ, मैं सरकारों की बोली में।
    सत्य वचन जी, बहुत सुंदर धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  16. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द ....भावमय करती रचना बधाई ।

    उत्तर देंहटाएं
  17. निर्धन नहीं रहेगा कोई, खबर छपी अख़बारों में,
    अनुदान ढूँढने निकला हूँ, मैं सरकारों की बोली में।
    विकल्प तो यही है
    वाह .. बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  18. शास्त्री स्पेशल!
    तीन बार गाकर टिपियाने आया हूं।
    भाव इतने स्पष्ट हैं कि कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं है।

    बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!
    राजभाषा हिन्दी पर – मशीन अनुवाद का विस्तार!
    मनोज पर -स्वरोदय विज्ञान’

    उत्तर देंहटाएं
  19. अच्छी प्रस्तुति के लिए बधाई |
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  20. वाह वाह शाश्त्रीजी आज तो झंडे से गाड दिये आपने. बहुत जोरदार रचना.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  21. वाह वाह शाश्त्रीजी आज तो झंडे से गाड दिये आपने. बहुत जोरदार रचना.

    रामराम

    उत्तर देंहटाएं
  22. सरकण्डे से बने झोंपड़े, निशि-दिन लोहा कूट रहे,
    आराम ढूँढने निकला हूँ, मैं बंजारों की खोली में।


    -बहुत जबरदस्त!

    उत्तर देंहटाएं
  23. हर एक पंक्ति बहुत कडुवा सत्य बयां कर रही है . बहुत प्रभावशाली रचना .
    आभार

    उत्तर देंहटाएं

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