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शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2010

"सुमन दुनिया को छलता है!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

  • मखमली सा ख्वाब, हर दिल में मचलता है।
    गन्ध से अपनी सुमन, दुनिया को छलता है।

    रात हो, दिन हो, उजाला या अन्धेरा हो,
    पुष्प के सौन्दर्य पर, षटपद मचलता है।
    गन्ध से अपनी सुमन, दुनिया को छलता है।।


    जेठ की दोपहर हो या माघ की शीतल पवन,
    प्रेम का सूरज हृदय से ही निकलता है।
    गन्ध से अपनी सुमन, दुनिया को छलता है।।

    रास्ते होगें अलग, पर मंजिलें तो एक हैं,
    लक्ष्य पाने को सफर दिन-रात चलता है।
    गन्ध से अपनी सुमन, दुनिया को छलता है।।

    आँधियाँ हरगिज बुझा सकती नही नन्हा दिया,
    प्यार का दीपक, हवा में तेज जलता है।
    गन्ध से अपनी सुमन, दुनिया को छलता है।।
    (चित्र गूगल छवि से साभार)

16 टिप्‍पणियां:

  1. मन को प्रसन्न कर देने वाली रचना ।

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  2. मनमोहक रचना है...बार बार पठनीय।

    उत्तर देंहटाएं
  3. गन्ध से अपनी सुमन, दुनिया को छलता है.nice

    उत्तर देंहटाएं
  4. पुष्प के सौन्दर्य पर, षटपद मचलता है
    ये बिम्ब मुझे अच्छा लगा। षटपद -- हेक्सापोडा।
    सरस और रोचक कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बड़ी ही मनोहारी ...सकारात्मक सन्देश देती रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  6. सर, कोई विषय तो छोड़ दीजिये :) और मुझे अपनी शरण में ले लीजिये...

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत ही मनभावन रचना है…………आभार्।

    उत्तर देंहटाएं
  8. सुन्दर गीत अगर छलता की जगह लुभाता है होता तो फूल की उपयोगिता बढ जाती। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  9. मखमली ख्याल की कल्पना आपजैसे लेखक ही कर सकते हें |पोस्ट बहुत अच्छी लगी बधाई
    आशा

    उत्तर देंहटाएं

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