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सोमवार, 20 अगस्त 2012

"बरगद का पेड़" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हमारे पुरखों ने
बरगद का एक पेड़ लगाया था,
आदर्शों के ऊँचे चबूतरे पर,
इसको सजाया था।
कुछ ही समय में,
यह देने लगा शीतल छाया,
परन्तु हमको,
यह फूटी आँख भी नही भाया।
इसकी शीतल छाया में,
हम पूरी तरह डूब गये,
और जल्दी ही,
इसके सुखों से ऊब गये।
हमने काट डाली,
इसकी एक बड़ी साख,
और अपने नापाक इरादों से,
बना डाला एक पाक।
हम अब भी लगे हैं,
इस वृक्ष को काटने में,
अपने कारनामों से,
लगे है दिलों को बाँटने में।
हे बूढ़े बरगद!
तूने हमारी हमेशा,
धूप और गर्मी से रक्षा की,
और हमने तेरी,
हर तरह से उपेक्षा की।
क्या तुझको आभास नही था,
हर परिवार में
बुड्ढों की यही होती गति है,
बूढ़े बरगद!
आज तेरी भी,
यही नियति है।।

24 टिप्‍पणियां:

  1. वाह बहुत गहन बात कही है बूढ़े दरख़्त के माध्यम से सच में यह एक कडवी सच्चाई है |बहुत अच्छा लिखा है ,शास्त्री जी इसे कल के चर्चामंच में पोस्ट कर दीजिये

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही मर्मस्पर्शी...सच हमने बरगद की कद्र नहीं जानी...आज इसकी शाखाएं भी एक-दूसरे से अनजान हैं...

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 22/08/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  4. शाखायें स्वयं को जड़ समझने लगीं..

    उत्तर देंहटाएं
  5. एक तरफ हिन्दुस्तान और दूसरी तरफ घर का बुजुर्ग बरगद का रूपक दोनों को रूपायित कर गया , हमने काट डाली,
    इसकी एक बड़ी साख,
    और अपने नापाक इरादों से,
    बना डाला एक पाक।
    हम अब भी लगे हैं,
    इस वृक्ष को काटने में,बाज़ नहीं आते आज भी क्षेत्र वाद के बाज़ ,काट रहें हैं शाख पे शाख ,बेंगलूर में कबूतर उड़ा रहें हैं कभी असम में ये बाज़ ....बढ़िया प्रस्तुति शास्त्री जी की .यहाँ "साख "तो ब्रांच (शाखा )के सन्दर्भ में है न की रेप्युटेशन के ,कवि को बेहतर मालूम है हमें तो सिर्फ जिज्ञासा है .कृपया यहाँ भी पधारें -
    ram ram bhai
    सोमवार, 20 अगस्त 2012
    सर्दी -जुकाम ,फ्ल्यू से बचाव के लिए भी काइरोप्रेक्टिक

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर....गहन अभिव्यक्ति..

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  7. काश! कोई बरगद की वेदना को समझे !!!
    शुभकामनायें!बरगद को ????

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुंदर !
    फिर भी बरगद तो बरगद है !

    उत्तर देंहटाएं
  9. गहन अभिव्यक्ति..बहुत सुन्दर..

    उत्तर देंहटाएं
  10. जीते हैं हम आजकल, टुकड़े टुकड़े टूट |
    थी अखंड गुजरी सदी, मची लूट पर लूट |

    मची लूट पर लूट, कूटनीतिज्ञ लूटते |
    मियाँमार सीलोन, सिन्धु बंगाल टूटते |

    हरा भरा संसार, हराया अपनों ने ही |
    नेही था घरबार, काटते पावन देहीं ||

    उत्तर देंहटाएं
  11. हर परिवार में
    बुड्ढों की यही होती गति है,
    बूढ़े बरगद!
    आज तेरी भी,
    यही नियति है।।

    वर्तमान का कडुवा सच.

    उत्तर देंहटाएं
  12. बूढ़े बरगद समान वृद्धों और देश दोनों की नियति एक समान ही लग रही है आजकल !
    दुखी कर देने वाला यथार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  13. गहन भाव लिए अक्षरश: सच कहा है आपने ... आभार

    उत्तर देंहटाएं
  14. बरगद के पेड के साथ बुजुर्गों की दशा के बारे में तुलना करती हुई शानदार रचना /बधाई आपको


    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है /जरुर पधारें /

    उत्तर देंहटाएं
  15. कोमल भावो की और मर्मस्पर्शी.. अभिवयक्ति .......

    उत्तर देंहटाएं
  16. बरगद के माध्यम से बहुत सारे कडवे सच उजागर कर दिए आपने ......सार्थक रचना !!!

    उत्तर देंहटाएं
  17. गहन अभिव्यक्ति .... आज बरगद की किसी को चाह नहीं होती

    उत्तर देंहटाएं
  18. ekdam satik rachna....aaj har taraf aisa hi ho raha hai...

    उत्तर देंहटाएं
  19. हमेशा की तरह ..अति उत्तम..

    उत्तर देंहटाएं

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