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शनिवार, 4 अगस्त 2012

"...गिजाई..." (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बरसात के मौसम में पढ़िए 
बालगीत "गिजाई"
छमछम-छमछम वर्षा आई।
रेंग रही हैं बहुत गिजाई।।
 
पेड़ों की जड़ के ऊपर भी,
कच्ची मिट्टी में भूपर भी,
इनका झुण्ड पड़ा दिखलाई।
 
ईश्वर के कैसे कमाल हैं,
ये देखो ये लाल-लाल हैं,
सीधी-सरल बहुत हैं भाई।

भोली-भालीकितनी प्यारी,
धवल-धवल तन पर हैं धारी,
कितनी सुन्दर काया पाई।

6 टिप्‍पणियां:

  1. कहां कहां से खोज लाते हों आप विषय लिखने के लिए .....

    :))

    उत्तर देंहटाएं
  2. बाप रे, देखते ही एक अजीब सा अवुभव होता था..

    उत्तर देंहटाएं
  3. ओह्ह्ह देखकर मन सिहर जाता है. इस पर भी रचना, वाह, कमाल है.

    उत्तर देंहटाएं
  4. an untouched insect on which a poem was written perhaps first time

    उत्तर देंहटाएं
  5. अनोखा विषय खोजा है शास्त्री जी ... बच्चों के मन को भाये .... बड़ों को झुरझुरी आ जाए ... सुन्दर रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. guru ji to mitti se bhee vishay nikaal lete hain...

    guru jee....agli baar kuchh mitti se sambandhit likhiyegaa!!

    उत्तर देंहटाएं

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