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रविवार, 26 अगस्त 2012

"आज जरूरत है धरती में, शौर्य बीज उपजाने की" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


माँ मुझको ताकत देना, कुछ अभिनव छन्द बनाने की।
आज जरूरत है जन-जन के सोये सुमन जगाने की।।

आँखे करके बन्द चमन के माली अलसाये हैं,
नौनिहाल पादप जीवन बगिया में मुरझाये हैं,
आज जरूरत है धरती में, शौर्य बीज उपजाने की।
आज जरूरत है जन-जन के सोये सुमन जगाने की।।

मँहगाई की चक्की में, निर्धन जन पिसते जाते हैं,
ढोंगी सन्त-महन्त मजे से, चन्दन घिसते जाते हैं,
आज जरूरत रावण से, सीता की लाज बचाने की।
आज जरूरत है जन-जन के सोये सुमन जगाने की।।

राम-कृष्ण की मर्यादा का ध्यान हमें धरना है,
दानव और दुर्दान्त-द्रोहियों का मर्दन करना है,
आज जरूरत है प्रताप जैसे तेवर अपनाने की।
आज जरूरत है जन-जन के सोये सुमन जगाने की।।

16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ख़ूब!
    आपकी यह सुन्दर प्रविष्टि कल दिनांक 27-08-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-984 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  2. सार्थक बात कहती रचना ...!!
    शुभकामनायें शास्त्री जी ..!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. सदा की तरह सार्थक और ओज से पूरित | सादर |

    उत्तर देंहटाएं
  4. सार्थक प्रस्‍तुति महाराण प्रताप की जीवनी पर
    यूनिक तकनीकी ब्लाग

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर जोश भरी पंक्तियाँ....

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर !
    जैनेटिकेली मौडीफाईड बीज बना ले जायेगा
    आदमी के दिमाग में अगर आ जायेगा !

    उत्तर देंहटाएं
  7. माँ मुझको ताकत देना, कुछ अभिनव छन्द बनाने की।
    आज जरूरत है जन-जन के सोये सुमन जगाने की।।

    उत्तर देंहटाएं
  8. प्रताप के स्‍मरण पर शुभकामनाएं।

    उत्तर देंहटाएं

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