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गुरुवार, 23 अगस्त 2012

"नद-नालों में नई जवानी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कई दिनों से नभ में,
बादल ने डाला है डेरा।
सूरज मना रहा है छुट्टी,
दिन में हुआ अन्धेरा।।
हरियाली बिखरी धरती पर,
दादुर गाते गान मधुर।
शाम ढली तो सन्नाटे को,
चीर रहा झींगुर का सुर।
आसमान का पानी पीकर,
धान खेत में लहराते।
काफल-सेब, खुमानी-आड़ू,
छटा अनोखी दिखलाते।
बाहर पानी-भीतर पानी,
पानी की है ग़जब रवानी।
इठलाती-बलखाती आयी,
नद-नालों में नई जवानी।
बरस रहा चौमास झमाझम,
बारिश में मत जाओ।
आलू, प्याज और बैंगन के,
गरम पकौड़े खाओ।
पढ़कर के अख़बार, आओ
काग़ज़ की नाव बनायें।
गड्ढों के ठहरे पानी में,
अपनी नौका तैरायें।

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब!......गाँव की याद आ गयी!.........

    उत्तर देंहटाएं
  2. ऐसा देश है मेरा...शानदार रचना |

    मेरे ब्लॉग पर आपका इंतजार रहेगा-
    "मन के कोने से..."

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रकृति नटी का बढ़िया विवरण देती पोस्ट ...बेहतरीन शब्द चित्र मौसम की रवायत का .
    कृपया यहाँ भी पधारें -
    "आतंकवादी धर्मनिरपेक्षता "-डॉ .वागीश मेहता ,डी .लिट .,/ http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/
    ram ram bhai/

    बृहस्पतिवार, 23 अगस्त 2012
    Neck Pain And The Chiropractic Lifestyle
    Neck Pain And The Chiropractic Lifestyle

    उत्तर देंहटाएं
  4. पंक्तियाँ मन -भावन हैं हीं ,पर दृष्य और आकर्षक -विशेष रूप से पकौड़ोंवाला,बस खट्टी चटनी की कसर रह गई !

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर दृश्यों के साथ
    कविता जैसे बोल रही है !

    उत्तर देंहटाएं
  6. वर्षा ऋतु के दृश्य दिखाती सुन्दर कविता !

    उत्तर देंहटाएं
  7. आई बारीस घनघोर , फिर याद आई वो कागज की कस्‍ती , याद दिलाने के लिये धन्‍यवाद सर
    यूनिक तकनीकी ब्लाकग

    उत्तर देंहटाएं

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